हमारी संस्कृति हमारा हाट: हाट बाजार एक परिदृश्य

हमारी संस्कृति हमारा हाट: हाट बाजार एक परिदृश्य

Published on August 7, 2026

Summary

This document explores the deep-rooted significance of the 'Haat Bazaar' (weekly market) in India, particularly within tribal culture. It details its cultural, social, and economic importance, while addressing modern challenges and suggesting ways to preserve this vital tradition.

हमारी संस्कृति हमारा हाट

हाट बाजार

एक परिदृश्य

प्रस्तावना

आदिवासी शब्द दो शब्दों आदि और वासी से मिलकर बना है और इसका अर्थमूल निवासी होता है आज हम आदिवासीयों का उत्सव हाट को लेकर अपनी बात कर रहे है हाट, हटिया या पेठिया आमतौर पर भारत के गाँवों में लगने वाले स्थानीय बाजार को कहा जाता है गाँव के लोगो की दैनिक जरूरतों को पूरा करने में हाट की भूमिका अतिमहत्वपूर्ण है। सदियों से भारत के गावों की आत्मनिर्भरता सुनिश्चित करने में हाट की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। आदिवासी भारत का एक ऐसा वर्ग है जो अरावली, विंध्याचल, सतपुडा, सहाड़ी पर्वत माला और चंबल, बनास, लूनी, साबरमती माही नर्मदा, ताप्ती गोदावरी नदियों की उत्पत्ति के समय से ही भारत की मूल मिट्टी में जन्मा उपजा मूलबीज मूल वंश है। सरल व सहज प्रकृति वाले लोगों के बीच आदिम परम्परा के कई अनगिनत प्राकृतिक उत्सव तथा त्यौहार मनाये जाते है इसमे एक त्यौहार जो महत्वपूर्ण है वह है हाट एक विशेष दिन होता है। हाट की रौनक आदिवासी समाज से ही है। आदिवासी प्रकृति पूजक होते है वे प्रकृति में पाये जाने वाले सभी जीव, जन्तु, वन, पर्वत, नदियाँ, नाले, खेत और सूर्य इन सभी सजीव, निर्जीव वस्तुओं की पूजा करते है। आदिवासी समुदाय मानते है की प्रकृति की हर वस्तु में जीवन होता है। ये किसी लिखित धर्म को नहीं मानते है। कई सालो पहले प्रकृति की गोद में पहाड़ो जंगलों में बसे आदिवासी क्षेत्रों में संचार तथा यातायात के साधन उपलब्ध नहीं होने की स्थिति में दूर- दूर रहने वाले रिश्तेदार, कुटुम्ब परिवार आपस में मिल नहीं पाते थे। पक्के मित्र, बच्चे, बूढे, एक-दूसरे से मिलने को तरस जाते थे ऐसी स्थिती में हाट के माध्यम सें एक-दूसरे से मिलकर प्रसन्न हो जाते है। विशेष हाट में सभी समाज सज-धज कर आते है तथा अपने परिजनो से मिलने की खुशी व्यक्त करते है और कुटूम्ब परिवार के साथ आनन्द मनाते है। यह हाट एक तरह का मेला है जो अनेक रंग रूप लेकर आता है और विविध रूप में अपनी छटा बिखेरता है।

तरह तरह के रंग रूप को लेकर आता हाट हवा मिलन की एक - दुजे संग लेकर आता हाट शिकवा हो या गिला किसी से दूर कराता हाट शहनाई, गाजे बाजे संग लगता है यह हाट


हाट क्या है

हाट वह परम्परा है जो किसी निश्चित स्थान पर निश्चित दिन तथा निश्चित समय पर समाज व विभिन्न समुदाय या घटक का तथा बाजार व समुदाय का एकत्रित होना होता है जिसमें वस्तुओं, विचारों के विनिमय से लेकर सम्बन्धों तथा जुड़ाव का सुत्रपात होता है। प्राचीन काल से चली आ रही हाट बाजार की परम्परा जनजातिय जीवन का एक अभिन्न अंग क्यों रहा है? इसका प्रमुख कारण है कि प्राचीन काल में हाट बाजार का बहुत ही महत्व और अपने जीवन में काम आने वाली सारी वस्तुएं हाट में मिल जाती थी, तथा अपने घर में बनाई हुई वस्तुएं बिक जाती थी। जैसे – किसान के घर में बकरा, मुर्गा व अण्डे, अनाज आदि एक ही जगह पर अपनी जरूरत की सारी चीजे मिल जाती थी, और बिक भी जाती थी, जिससे समुदाय को इधर-उधर भटकना नहीं पड़ता था। किसान वर्ग अपना काम छोड़कर हाट में जाते थे। अर्थात तात्पर्य यह है कि भटकाव को दूर कर जहां जमाव दिखाई दे वहीं हाट है।

हाट का महत्व

हाट बाजार स्थानीय व्यवसाय और व्यापार को बढाने का उत्तम उपाय है जिससे स्थानीय अर्थतंत्र को मजबूती तो मिलती है। साथ ही उस क्षेत्र के लोगों का आर्थिक विकास भी होता है। इसी के साथ वे प्राचीन मंदिर या प्राचीन स्थल जो शिल्प की दृष्टि से बहुत उत्तम है लेकिन इतिहास में उनका स्थान नहीं है उन्हें सामने लाने के लिए भी हाट महत्वपूर्ण है। उदाहरण के तौर पर यदि हम बाँसवाड़ा जिले के अरथूना नामक क्षेत्र में हनुमानगढी के नाम से पहचाने जाने वाले प्राचीन मंदिरों के एक समूह को देखे तो ये मंदिर झुंड बेहद सुंदर व शांतिपूर्ण मंदिर है ये आस्था के अनुयायियो और पूरे भारत वास्तुशिल्प सौंदर्य के प्रंशसको को आकर्षित करते है। यहां लोगों का जमावडा कम होता है। किन्तु 5/10 साल पहले इसके पुनरुद्वार के बाद से बाजार क्षेत्र में एक मुख्य आधार रहा है और यह तेजी से लोकप्रिय हो रहा है क्योंकि अधिक से अधिक पर्यटक हनुमानगढ़ी में जाने लगे है। पुरा दिन जब बाजार लगता है। लोगो का झुंड युवा से बुढे स्थानीय गाँवों से गलियारों से गुजरते हैं। परिचित चेहरो के साथ बातचीत करते हैं व माहौल को खुशनुमा बनाते है। पहले के समय में हाट का बहुत महत्त्व होता था जैसे की किसी परिवार के रिश्ते की बात आती थी तो दोनों पक्षों के लोग बैठकर निर्णय लेते थे कि लड़का और लड़की को हाट में दिखाएंगे उनको पसन्द आया तो रिश्ता जोड देते थे। हाट में अपने सम्बन्धी लोगों से मुलाकात भी हो जाती थी। हाट को देखते हुए किसान उस दिन अपना काम बन्द करके हाट में जाते थे। तथा साप्ताहिक हाट ग्रामीण हाट बाजार प्राचीन परम्पराओं से जुड़े व्यवसाय के आपसी सम्बन्धों की बुनियाद आज भी बकरार रखे हुए है। हाट बाजार काफी समय से ग्रामीण समुदायों के जीवन के लिए आदिवासी एवं स्वराज की संस्कृति महत्वपूर्ण रहे हैं।

हाट बाजार के विभिन्न कार्य है, प्राथमिक उद्देश्य स्थानीय समुदायों के लिए बाजार उपलब्ध कराना है, ऐतिहासिक रूप से हाट एक अस्थायी बाजार था जो लोगो को उन सामानों को खरीदने की अनुमति देता था जिन तक वे आसानी से नहीं पहुंच सकते थे वो हाट बाजार में बड़े पैमाने पर विक्रेता बाहर के समुदाय से होते हैं। उदाहरण-अरधूना हाट मे रतलाम, अहमदाबाद, उदयपुर, बांसवाड़ा और अन्य निकट व दूर स्थानों से विक्रेता साप्ताहिक आते हैं। यदि हाट को परिभाषित कर दें, तो हाट बाजार दक्षिणी राजस्थान में ग्रामीण बाजारों को समझने की दिशा में एक कदम है दूर दराज की बिखरी हुई बस्तियां जो चीजों को आसानी से नहीं खरीद सकती है वह हाट के कारण एक जगह पर एकत्रित होती है और वस्तुओं को खरीदती है उपयुक्त सभी उदाहरणों के माध्यम से हम यह कह सकते है की हाट का वर्तमान परिपेक्ष्य में महत्व है।

१. सांस्कृतिक महत्व

२. आर्थिक महत्व

3. सामाजिक महत्व

सांस्कृतिक महत्व

प्राचीन काल से चली आ रही हाट बाजार की परंपरा हमारे जीवन का एक अभिन्न अंग है जिस समय यातायात के आवागमन के कोई साधन नहीं होते थे तो लोग बैलगाड़ी व पैदल चलकर हाट लगने वाले स्थान पर पंहुचते, और आज भी कई लोग अपने-अपने स्तर पर मोटर साइकिल, बस, ऑटो, साईकिल आदि से अलग-अलग परिधानों में सजधज कर स्थानीय गीत-गाते हुए महिला – पुरुष बालक - बालिकाएं अलग-अलग टोलों में ढ़ोल नगाड़ो के साथ गाते बजाते हुए आनंद के साथ झूमते हुए अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करते हाट में आते, जिससे आपसी प्रेम भाव के साथ ही एक ही स्थान पर विभिन्न समुदायों की संस्कृती देखने को मिलती है एक गाँव की संस्कृती अन्य कई गाँवो तक पहुंचती है, अपने पारम्परिक पोशाको में महिला-पुरुष समान रूप से स्वयं की संस्कृती को प्रदर्शित करते और हर सप्ताह लगने वाले हाट में अपने रिश्तेदारों से मिलकर हाल-चाल पूछते और बातो ही बातो में रिश्ते भी बन जाते है हाट के दिन विभिन्न समुदाय के लोग बिना किसी भेदभाव के हाट का आनंद लेते है हाट विभिन्न समुदायों की संस्कृतियों का एक छोटा सा संगम है।'

आर्थिक महत्व

बड़े बड़े शहरों और कस्बो, गांवों में सभी चीजें नहीं मिलती थी उस समय में हाट प्रथा ने जन्म लिया बड़े-बड़े शहरों, कस्बो से व्यापारी एक साथ एक निश्चित दिन पर गांव में इकट्ठे होते हैं या तो उस गांव की मुख्य सड़क पर या अन्यत्र कहीं कोई खाली स्थान हो वहां पर यह सब लोग एक बाजार की तरह सड़क के दोनों तरफ दुकानें सजा देते हैं। ग्रामीणों को इंतजार होता है उस हाट वाले दिन का चाहे वो रविवार हो या शनिवार इसके मूल में यही भावना होती है की सारी चीजें एक ही स्थान पर ग्रामीणों को उपलब्ध हो जाएं, जब लोग हाट में आते है तो अपनी आवश्यकतानुसार सुई से लेकर चांदी के गहने, वस्त्र, मसाले, साप्ताहिक सब्जियां, बच्चो के खाने-पीने का सामान, आदि सामग्री के बदले या किसी नगद के रूप में एक ही स्थान पर मिल जाने से कम खर्च में अधिक सामान उपलब्ध होने पर परिवार में बचत और अन्य किसी भी प्रकार का अतिरिक्त खर्च नहीं होता, यह अर्थवयवस्था का तंत्र समाज व समुदाय द्वारा विकसीत किया गया है जिसे किसी भी सरकारी व्यवस्था की दरकरार नहीं होती। तथा हस्तक्षेप भी नहीं होता है, ना ही किसी प्रकार का झंझट और ना ही परिवहन में अपने साजो सामान लाने व ले जाने का खर्च इस प्रकार कई तरह के खर्चों से छुटकारा और बचत में प्रमुख रूप से सभी वर्गो में विभिन्न स्थानों पर लगने वाले हाट बाजार से क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को बल मिलता है। सही रूप से आत्मनिर्भर बनाने और स्थानीय वस्तुओं के प्रयोग को बढ़ावा देने में हाट बाजार अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। एक और जहां बड़ी बड़ी कंपनीया और कारखाने शहरों में रहने वालों की आवश्यकताओ की आपूर्ति में असमर्थ होते है। वहीं अलग-अलग क्षेत्रों में लगने वाले हाट बाजार सभी क्षेत्रों की आर्थिक स्थिती को मजबूत करते है।

सामाजिक महत्व

हाट के सामाजिक महत्वों की बात करें तो समाज के हर घटक को जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम है जो कि पीढ़ियों का पीढ़ियों के साथ, विभिन्न वर्गो आपस में समुदाय व व्यापारीयों तथा नवीन व परम्परागत वस्तुओं व फैशन को जोड़ने का माध्यम है। हाट बाजार का सामाजिक रूप से बढ़ा महत्व है हाट सगे संबंधियों का मिलन स्थल, नवयुवक-युवतियाँ अपने जीवनसाथी की पहचान भी इसी हाट बाजार में कर लेते है, समाज में चल रही वार्तालाप के बारे में सम्पूर्ण जानकारी मिल जाती है, इस दिन किसी भी व्यक्ति व रिश्तेदार, दोस्त से मुलाकात हाट में हो जाना तय है। आसपास के गांवों में इस दिन विशेष चहल-पहल रहती है। एक तरफ जहां सामाजिक एकता और अखंडता को बनाए रखने में हाट बाजार उपयोगी है वही अमीर-गरीब के बीच कोई भेदभाव नहीं, बिना किसी भेदभाव के सभी वर्गो में समानता लिए हुए आपसी प्रेम भाव व सामाजिक सोहार्द बनाये रखने में हाट सहायक है।

आदिवासी संस्कृति में हाट का संबंध

हाट बाजारो में हर आदिवासी पुरुष व महिला अपने पारंपरिक वेशभूषा में सज धज कर आते है। महिला व पुरुष वर्ग की टोलीयां ढोल-मादंल, थाली लेकर बाजारों में आते है। इनकी थाप पर ताल के साथ अपने पारंपरिक लोक नृत्य करते हुए हाट बाजारो में आनंद लेते है।

आदिवासी संस्कृति में हाट एक अभिन्न अंग है जिसमे आदिवासी संस्कृति से जुड़ी सामग्री-होली के रंग, ढोल, कुंडी, तीर-कामठा, काबरा, घुघरा, आदिवासी घड़ी, ओढ़नी, दुशाला, धोती, कमीज, फेटा, ताज कोदरा, हामली, कुरी, बट्टी, गूंद, टिमरू, हुंडी, लकड़ी के खाट आदि पारम्परिक सामग्री स्थानीय हाट में ही मिल जाती है। आदिवासी समाज में प्रकृति से ही लेकर पुनः उसे अर्पित करने की शिक्षा निरंतर एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को दी जाती है। प्रकृति से प्राप्त वस्तुओं से उपयोगी वस्तुओं के निर्माण में लागत कम होने से उनकी कीमतों पर अधिक प्रभाव भी नहीं पड़ता है। जिससे सभी वर्गों के लोग सरलता से वस्तुओं की खरीदी करने में सक्षम होते है। अलग-अलग क्षेत्र से अलग-अलग प्रकार से महिला, बालिकाएं गीत गाते हुए आती है, इस तरह हाट और आदिवासी एक दुसरे के पूरक है। आदिवासी संस्कृति हाट के माध्यम से हमें एक ऐसी व्यवस्था अपनाने को प्रेरित करती है, जो प्रकृति के नियमों का पालन कर सतत विकास की दिशा में आगे बढ़ाती है।

स्वराज के परिपेक्ष में हाट का महत्व

हाट आमतौर पर भारत के गाँवों में लगने वाले स्थानीय बाजार को कहा जाता है। सब्जी, फल, खाद्यान्न या परचून सामग्री आदि हाट में खरीद-बिक्री की जानेवाली प्रमुख हैं। गाँव के लोगों की दैनिक जरुरतों को पूरा करने में हाट की अतिमहत्वपूर्ण भूमिका है। सदियों से भारत के गाँवों की आत्मनिर्भरता सुनिश्चित करने में हाट की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। सामान्यतया गाँवों में लगने वाले हाट उस क्षेत्र में बाजार का विस्तार एवं दूरी हाट की अवधि को तय करती है। यह गैर निर्भरता का स्पष्ट उदाहरण है।

स्थायी तौर पर बनी सब्जी मंडी हाट का विकसित रूप है। हाट बाजार में विभिन्न समुदायों के लोग एक ही स्थान पर ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करने वाले लोग प्रकृति को ध्यान में रखते हुये अपने उपभोग की वस्तुओं की व्यवस्था करते हुए हाट में लाते है। हाट स्थानीयता, आत्मनिर्भरता, सतत विकास के साथ बढ़ते क्रम में शांति का संदेश देता है। वास्तव में समाज प्रकृतिवाद, मानववाद तथा लोकतंत्र के सर्वाधिक करीब है। ग्रामीण लोग ज्यादा आत्मनिर्भर है। हाट ने शांति, भाईचारा, मानवता, प्रकृति संरक्षण-संवर्धन का रूप दिया। ये सभी रूप वर्तमान समय में हाट बाजार में देखने को मिलते है। स्वराज के रूप में हाट विभिन्न समुदायों का निवास है।

हाट का भारतीय इतिहास में महत्व तथा गतिविधियाँ

भारतीय इतिहास में हाथ से काम करने वाले शिल्पकार, कपड़ा उद्योग, आभूषण उद्योग, इमारती सामान तथा भवन निर्माण, हाथी दांत का काम, मिट्टी के बर्तन, चमड़ा उद्योग, तेल व इत्र, चीनी उद्योग खाने-पिने का सामान आदि सामाजिक व आर्थिक रूप से विकास के मामले में विश्व के बहुत से देशों से आगे था। इन सभी सामानों को व्यापारी एक स्थान से दुसरे स्थान पर ले जाने के लिए ऊंट, हाथी, घोड़े, बैलगाड़ी व पैदल चलकर खरीदने व बेचने के लिए स्थानीय व्यापारी निश्चित समय में एक निश्चित जगह में अपने स्थानीय व्यवसाय और व्यापार को बढ़ाने के लिए अपने गाँव, कस्बों, शहरों में जाकर लोगो को अपने सामान बेचते थे, साथ ही कई लोग बड़े उत्साह से त्योहारों, मेलों पारम्परिक आयोजनों के समय इनके आने का इन्तजार करते थे उस समय यातायात के साधनों का अभाव था तो आस पास के गाँवो से लोग आते और अपनी जरूरत के हिसाब से सामान खरीदते व बेचते रहे है, जिसे चलता फिरता बाजार के नाम से भी जाना गया, यह बहुत पुरानी व्यवस्था रही है जो कई रूपों में व्यवस्थित रूप से सक्रिय रही।

इस तरह हाट में अनेक प्रकार की गतिविधियों का संचालन भी होता रहा है जो लोगों को उन सामानों को खरीदने की अनुमति देते थे, जहाँ वो आसानी से नहीं पहुँच सकते थे। वे सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक और यहां तक कि राजनीतिक गतिविधियों में शामिल होने के लिए, समाचार और जानकारी इकट्ठा करने, विचारों और ज्ञान का आदान-प्रदान करने के लिए एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते। जो एकता और शक्ति की भावना को उजागर करते हैं। सम्पूर्ण भारत के विभिन्न क्षेत्रों में भी हाट बाजार की परम्परा रही है। हाट बाजार मे दैनिक उपयोग से लेकर खाने पीने की वस्तुओं तक सभी उपलब्ध रहती है। जिसकी खरीदारी बड़े स्तर पर की जाती है। इस तरह इतिहास में हाट का महत्वपूर्ण स्थान रहा है।

वर्तमान परिपेक्ष में हाट का महत्व

वर्तमान समय में सप्ताह के सातों दिनो के अनुसार हाट बाजार अलग-अलग स्थानों पर लगते है। हाट बाजार उत्तम उपाय है। जिससे स्थानीय अर्थतन्त्र को मजबूती तो मिलती है साथ ही उस क्षेत्र के लोगों का आर्थिक विकास भी होता है। हालाकि हाट बाजार के विभिन्न कार्य हैं, प्राथमिक उद्देश्य स्थानीय समुदायों के लिए बाजार उपलब्ध कराना है। आजकल कई ग्रामीण स्थानों में स्थायी दुकानें और बाजार खुल रहे हैं, हाट बाजार में विक्रेता बड़े पैमाने पर ऐसे लोग हैं जो उन समुदायों के बाहर से हैं। हाट में कीमतें बाजार दरों से कम होती हैं, इसलिए दुकान लगाने के लिए पंचायत को भुगतान और अन्य खर्चों के बाद भी अच्छी आमदनी कर लेता है स्थानीय लोगो को सस्ते दामो में आवश्यक सामान बिना किसी मोल भाव के आसानी से मिल जाता है। हाट-बाजारों की शक्ल अब बदल गई हैं। तीन-चार कोस पर किसी गांव में लगने वाले बाजार में आसपास के आठ-दस गांव के लोग जुटते है। वे प्रायः मझोले किसान होते और अपनी फसल का थोड़ा-सा हिस्सा बेचने के लिए बैलगाड़ियों में लादकर लाते।

छोटी जोत की किसानी करने वाले अपने सिरों पर अनाज रखकर, उसकी बिक्री कर और अपनी जरूरत का सामान बांधकर घर लौट जाते। कई बार यह खरीदारी इतनी कम होती कि उन चीजों की खपत दो-तीन दिनों में ही हो जाती और फिर अगले बाजार का बैचेनी से इंतजार होता है।

हाट में बिकने वाली वस्तुओं में दाल, मसाले, गुड़, सरसों, मिट्टी का तेल, कुप्पी, साबुन, कंघी और खाने के दूसरे छोटे-बड़े सामान, कपड़ा, आलू-सब्जी की दुकानें तथा नाई से हजामत बनवाने का भी काम होता। पान और चाट के नुक्कड़ भी सज जाते। मांस-मछली की बिक्री होती, तो भीड़ से थोड़ा हटकर बैलों और घोड़ों के नाल लगाने तथा उनकी पूंछों के बाल कतरने वाले अपने कारोबार में जुटे होते। कोई एक दवाखाना भी उसी घेरे में आ जमा होता। इन बाजारों में मिट्टी के बर्तन भी बिकते देखने को मिल जाते है इस प्रकार कई तरह से सामाजिक, आर्थिक व राजनेतिक रूप से भी हाट का महत्व बढ़ा है।

हाट के सुदढ़ीकरण की आवश्यकता तथा किस प्रकार किया जा सकता है

मुक्त अर्थव्यवस्था ने गांव के ढांचे को ही तोड़ा बदला नहीं, परंपरागत हाट - बाजार के परिदृश्य को भी उलट दिया है। स्थानीय विक्रेताओं और हाट बाजार विक्रेताओं के बीच एक अनूठा तनाव पैदा होने लगा है जो बाहरी क्षेत्रों से अपने उत्पादों को बेचने के लिए आते हैं। जरूरत की चीजों की खरीदारी के लिए लोग अब मोटर वाहनों से निकटवर्ती कस्बों में जाने लगे हैं। जो पक्की सड़कें गांव के निकट से गुजर कर शहर की तरफ जाती हैं, उनके किनारे बड़ी संख्या में दुकानें हैं, जिनसे देहात के बाजारों की रौनक कम होने के साथ वहां लोगों की उपस्थिति घटी है। ठंडे पेय और पैकट बंद चीजें बेचने वालों ने अब बाजार की नई संस्कृति विकसित की है।

नए बाजार की संस्कृति अब गांव के छोटे हाट-बाजारों को पनपने भी नहीं देना चाहती। गांव में छोटी जोत वाला बड़े लोगों से अपनी घर-गृहस्ती चलाने के लिए जो उधार-कर्ज लेता था, उसे निपटाने के लिए उसके पास साप्ताहिक बाजार में अनाज बेचकर देने का रास्ता होता था, जिसे नए बाजार ने बंद कर दिया है। एक समय बाजार स्वयं चलकर गांव आता था। तब अनाज के बदले चीजों की खरीदारी का चलन था। रसोई का सामान, मसाले, बर्फ, चाट, धान का चूरा जैसी वस्तुओं की अदला-बदली का व्यापार बड़ा दिलचस्प था।

देहात के बाजारों में किसानों की फसल के खरीदार भी छोटे व्यापारी या बनिये हुआ करते थे, जो थोड़ी पूंजी से सप्ताह भर में कुछ काम चलाऊ कमाई करते, पर उनमें किसानों के शोषण की मंडियों जैसी बड़ी घटतौली वाली गुंजाइश नहीं होती थी। नोटबंदी के दौर में गांव के बाजार की यह धुरी जैसे एकदम टूट गई। दुखद है कि उनकी वह रौनक अब तक वापस नहीं लौटी। गरीब जनता के जीवन-यापन में छोटे हाट-बाजार का इस तरह नष्ट होते चले जाना बहुत त्रासद है। गांव की गरीब जनता के घर चलाने में ये लघु बाजार कभी बहुत सहायक थे, जो इन दिनों अंतिम सांसें गिन रहे हैं। इसलिए हाट को मजबूत करने के लिए-

  1. हाट में स्थानीय व्यापारियों को प्रथम प्राथमिकता, पंचायतो के द्वारा आगे आकर निःशुल्क स्थान उपलब्ध करवाना, दैनिक जीवन में उपयोग आने वाली स्थानिय वस्तुओं को महत्व देना।

  2. हाट बाजार में प्लास्टिक पेक सामानों पर पूर्ण रूप से प्रतिबन्ध, स्थानीय स्तर पर मेडिकल सुविधाएं उपलब्ध करवाना। उत्पादो के आधार पर दुकानों को लगवाना। हाट में सर्दी, धुप, बरसात के समय सभी के लिए जगह उपलब्ध करवाने की व्यवस्था करवाना, आस-पास के गांवों में प्रचार- प्रसार करना, हाट में शांति पूर्ण व्यवस्था बनाये रखने के लिय पुलिस प्रशासन का सहयोग लेना। सांस्कृतिक कार्यक्रमों को बढ़ावा देना, स्थानीय उत्पादों को प्रोत्साहन देने में सहयोग करना, स्थानीय एवं बाहरी विक्रेताओ के बीच मनमुटाव को कम करना।

  3. सरकारी व गैर सरकारी संस्थाओ के सहयोग से हाट को आधुनिकता से जोड़ना।

  4. स्थानीय प्रतिभाओ को प्रतियोगिताओ में शामिल करना।

ध्यान रखने योग्य बाते

हाट आज हमारे जीवन का एक बहुत ही महत्वपूर्ण हिस्सा बन चूका है। शहरों से लेकर गांव तक आज लोगों की हर जरूरत का सामान बाजारों में मिल जाता है। परन्तु समय के साथ बाजारों का दुरुपयोग भी बढ़ा है । आजकल हाट बाजारों में जरूरत की वस्तुओ के बजाय वे वस्तुएँ अधिक दिखाई देती है जिनकी आवश्यकता नहीं होती है। इसी के साथ ही भीड़ इतनी मात्रा में बढ़ जाती है की आमजन को परेशानी उठानी पडती है। तेज आवाज में चलने वाले गाने शोर का कारण बनते हैं। इसी के साथ इस बात का ध्यान रखना भी बहुत जरूरी है की दुकानों को उस क्रम में लगाए की पैदल चलने वाले लोगो को समस्या न हो। विशेषतौर पर यही बात साबित होती है की हाट हमारी संस्कृति की धरोहर है आदिवासी समाज के साथ-साथ यह हमारी भी पहचान है, अतः हाट को जीवित रखने में और जीवन्त बनाने में अपना पूर्ण सहयोग प्रदान करे।

Community-level Circular Living Practices