पोषण संवेदी खेती: किसान खेत पाठशाला मार्गदर्शिका
Published on January 30, 2026
Summary
A comprehensive guidebook for Farmer Field Schools on nutrition-sensitive farming, aiming to combat malnutrition by integrating traditional and sustainable agricultural practices. It covers topics from crop selection and pest control to balanced diets and socio-economic impacts.
पोषण संवेदी खेती
किसान खेत पाठशाला-मार्गदर्शिका
VAAGDHARA
प्रस्तावना
वाग्धारा संस्था का मूल उद्देश्य है-कृषक और आदिवासी समुदायों के बीच स्थायी, समावेशी और गरिमामय विकास की नींव को मजबूत करना। विगत दो दशकों से संस्था दक्षिणी राजस्थान तथा उससे सटे मध्यप्रदेश एवं गुजरात के सीमावर्ती आदिवासी अंचलों में कुपोषण और स्वास्थ्य समस्याओं के स्थानीय समाधान खोजने, पारंपरिक कृषितंत्र के पुनरुद्धार, और पर्यावरण अनुकूल चक्रीय जीवनशैली को बढ़ावा देने की दिशा में निरंतर प्रयासरत है।
वाग्धारा का यह विश्वास रहा है कि पर्यावरण अनुकूल खेती, पारंपरिक खानपान और स्थानीय पोषण विधियां-बच्चों, महिलाओं, पूरे समुदाय तथा प्रकृति के घटकों (जैसे मिट्टी, जल, बीज, पशुधन आदि) के समग्र विकास की आधारशिला बन सकती हैं। इसी सोच को साकार करने हेतु किसान पाठशाला के माध्यम से विभिन्न कक्षाओं की एक श्रृंखला एवं एक सशक्त पहल के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। इस श्रृंखला की प्रत्येक कक्षा इस प्रकार तैयार की गई है कि यह महिला किसानों एवं समुदाय के अन्य सदस्यों को पारंपरिक/सच्ची खेती, पोषण, आहार विविधता तथा प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण से जुड़ा व्यावहारिक एवं सशक्त ज्ञान प्रदान कर सके।
“पोषण-संवेदी खेती” केवल एक कृषि पद्धति नहीं, बल्कि एक परिवर्तनशील विचार है, जो खाद्य उत्पादन को पोषण, स्वास्थ्य और आजीविका के साथ जोड़ता है। यह पद्धति न केवल पोषक तत्वों से भरपूर उत्पादन पर बल देती है, बल्कि पर्यावरण संतुलन का भी विशेष ध्यान रखती है। विशेषकर आदिवासी अंचलों में, जहाँ खेती ही जीवन का आधार है और कुपोषण एक प्रमुख चुनौती, वहाँ यह पद्धति एक व्यवहारिक समाधान बनकर उभरती है। पारंपरिक ज्ञान, स्थानीय संसाधन और सांस्कृतिक विरासत – ये सब आदिवासी क्षेत्रों की विशेष पहचान है। इन्हीं मूल्यों को आधार बनाकर “पोषण संवेदी खेती” एक ऐसा मॉडल प्रस्तुत करती है, जो समाज को स्वास्थ्य, आत्मनिर्भरता और पर्यावरणीय संतुलन की ओर अग्रसर करता है। यह बदलाव की वह शुरुआत है, जो जड़ों से जुड़कर भविष्य को सुरक्षित बनाती है।
यह किसान पाठशाला इस विश्वास के साथ आरंभ की जा रही है कि हमारी परंपराएं हमारा ज्ञान और हमारी मिट्टी-मिलकर एक ऐसा रास्ता बना सकते हैं जो पोषण, समृद्धि और स्वराज की ओर ले जाए। आइए, मिलकर इस परिवर्तन यात्रा में सहभागी बनें।
किसान खेत पाठशाला क्या है।
किसान खेत पाठशाला कृषि क्षेत्र में नवाचार, पारंपरिक तकनीकी ज्ञान और कौशल को बढ़ावा देती हैं। यह पाठशाला किसानों को हाँगणी खेती की विभिन्न तकनीकों को, जो जल हितेषी एवं पर्यावरण अनुकूल है, को सिखाती है साथ ही बेहतर फसल प्रबंधन एवं उत्पादन के साथ सामाजिक-आर्थिक मुद्दों में प्रशिक्षित करती है। पाठशाला के माध्यम से सहभागी किसान सामूहिक प्रयासों से अपनी खेती को लगातार बदलते पर्यावास में एवं घटते जल स्तर जैसी विषम परिस्थितियों में भी संवहनीय बनाने का प्रयास करते है।
किसान खेत पाठशाला एक नूतन, सहभागी और विश्लेषण का तरीका है जिसका जोर समस्या समाधान और खोज आधारित सीख पर होता है। किसान खेत पाठशाला का उद्देश्य उनके उत्पादन तंत्र का विश्लेषण, समस्या की पहचान, संभावित समस्याओं का परिक्षण करने की क्षमता विकसित करना है, और अंत में उनके खेती तंत्र के लिए उपयुक्त, सर्वश्रेष्ठ अभ्यासों को अपनाने के लिए प्रेरित करना है। (FAO-2003)
इसे एक कार्य-पुस्तिका के रुप मे बनाया गया है जिसको प्रयोग करके सहजकर्ता, स्वयंसेवक किसान खेत पाठशाला का सफलतापूर्वक संचालन कर सके और वे किसान समूहों को प्राकृतिक कीट नियंत्रण से टिकाऊ खेती उत्पादन के समाजिक व आर्थिक महत्व को जोड़कर देखने मे मदद कर सके। पी.एल.ए. के माध्यम से सहजकर्ता किसानों को दिशा दिखाता है कि प्राकृतिक कीट नियंत्रण के परिपेक्ष मे मुद्दों पर सही अर्थो मे संवाद कर सके ओर प्राथमिकता निश्चित कर सके। जलवायु परिवर्तन की समस्या के पीछे छिपे कारणों को समझ सकेंगे और अपने पास उपलब्ध संसाधनों व सेवाओं को सक्रिय करने की रणनीतियाँ बनाकर उनका क्रियान्वन कर सकेंगे व अपने कार्यो और इनके परिणामों का मूल्यांकन भी कर सकेंगे।
वर्तमान परिप्रेक्ष्य में किसान खेत पाठशाला की आवश्यकता क्यों है?
किसान खेत पाठशाला, किसान को एक अवसर भी प्रदान करता है कि वह टिकाऊ-भूमि उपयोग की तकनीकियों का मूल्यांकन/जांच कर सके और अपनी कृषि विरासत के परम्परागत तरीकों के साथ उनकी तुलना करके उपयुक्त तरीके की पहचान करें और उनको अपनाए।
किसान खेत पाठशाला एक समयबद्ध गतिविधि है, जो सामान्यतः एक फसल चक्र या एक उत्पादन काल के साथ जुडी होती है। किसान खेत पाठशाला में किसानों का एक समूह हिस्सा लेता है जिसमे प्रायः 15-20 किसान सम्मिलित होते है।
किसान खेत पाठशाला का संचालन सहजकर्ता द्वारा किया जाता है, जिसे किसान खेत पाठशाल सहजकर्ता के रूप में जाना जाता है।
इसमें सामूहिक निरिक्षण, चर्चा, विश्लेषण, प्रस्तुतीकरण और सामूहिक निर्णय व क्रियान्वन के अभ्यास किये जाते हैं।
इस पाठशाला का मुख्य घटक खेत है एक सहभागी तुलनात्मक प्रयोग का स्थापित करना या इसे सहभागी तकनिकी विकास भी कहा जाता है, जहाँ खेत-पाठशाला के विचार को किसान अपने अभ्यास में अपना लेते हैं।
खेत ही सीखने और सीखाने का स्थान है :
खेत-पाठशाला कार्यक्रम में सीखने का स्थान होता है "खेत” इसमें दो तरीके अपनाये जाते हैं।
(अ) प्रथम तरीका
एक किसान का खेत पाठशाला का काम करता है, जहाँ सभी समूह सदस्य आकर खेत पाठशाला से सीखते है।
(आ) दूसरा तरीका
सभी किसान अपने अपने खेत को पाठशाला से मिली सीख के अनुरूप विकसित करने का काम करते है और सभी सदस्य स्वयं के एवं एक दुसरे के खेत में सीखते है।
सहभागी सीख एवं खेतीकार्य (पी.एल.ए.) किस प्रकार मदद करता है?
सामुदायिक सदस्य चर्चाओं के माध्यम से जलवायु परिवर्तन के लक्षण जानने व मापने के तरीके उसके कारक व प्रभाव को समझ जाते हैं।
प्राकृतिक कीट नियंत्रण के पीढ़ीगत प्रभाव पर किसान समुदाय की समझ बनेगी और वे यह भी समझ पायेंगे कि अलग-अलग मौसमीय कुप्रभाव के इस चक्र को कैसे तोड़ा जा सकता है।
खेती-बाड़ी के पूर्ण देखभाल पर चर्चा कर सकेंगे। उनके खाद्य सुरक्षा एवं जलवायु परिवर्तन को जोड़कर देख/समझ सकेंगे।
जलवायु परिवर्तन के परिपेक्ष मे खाद्य पदार्थो की उपलब्धता, अनुपजाये जानेवाले पदार्थो का संरक्षण व प्राकृतिक संसाधनों प्रबन्धन की टिकाऊ योजना बना सके।
समुदाय के सदस्य जलवायु सक्षम खेती से जोड़कर देखना सीख जाते हैं।
सहजकर्ता की भूमिका
किसान खेत पाठशाला में सहजकर्ता किसानों को हाँगणी खेती पद्धति के अंतर्गत खेत तैयारी से लेकर फसल संग्रहण तक की विभिन्न अवस्थाओं में सहायता और मार्गदर्शन प्रदान करता हैं। सहजकर्ता का मुख्य उद्देश्य किसानों को खेती से जुड़े विभिन्न आयामों जैसे कि सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, पर्यावरणीय पहलुओं से अवगत कराता है साथ ही हाँगणी खेती से जुडी नवाचारिक तकनीकों, फसल प्रबंधन, विपणन और अन्य कृषि संबंधित मुद्दों के बारे में समझ बनाने एवं उनसे निपटने में सक्षम बनाने हेतु किसानो का मार्गदर्शन करता है ताकि वे अधिक उत्पादक और लाभकारी हो सकें । सह्नकर्ता पाठशाला के दौरान किसानो के हित में संचालित विभिन्न सरकारी योजनाओं के बारे में भी जानकारी प्रदान करता हैं ताकि किसान समग्र रूप से अपनी खेती को लाभकारी बना सके। इस प्रकार, सहजकर्ता किसानों के लिए एक महत्वपूर्ण संवेदनशील और सहायक संसाधन होती हैं, जो उन्हें स्वतंत्र और सशक्त बनाने में मदद करती हैं।
सहभागी सीख व कार्य प्रक्रिया व तैयारी
पहली कक्षा के समय सहजकर्ता अपना परिचय दे व सभी समुह सदस्यों को अपना परिचय देने के लिये प्रेरित करे। ध्यान रखे कोइ कुछ बात छूट न जावे। चर्चा की शुरुआत मे सम्बन्ध स्थापित करने कुछ खेल अभ्यास करे। प्रत्येक सहजकर्ता यह नियत करेगी की वह स्वयं उपने आपका कैसे परिचय दे। वह फिर समूह को बतायेगी की वह कोई प्रशिक्षक या शिक्षक नहीं है। फिर चर्चा मे लायेगी की दोनो भूमिका मे क्या अन्तर हैं। सहजकर्ता दिशा दिखाने का कार्य नहीं करे वरन वे एक अच्छे श्रोता की भूमिका अपनाये वे समस्या पहचान नियोजन की प्रक्रिया को सहज व सरल बनाये। सहजकर्ता समुदाय की सुने और सीखे और दुसरे समूह मे अपने अनुभव को बाटें व यदि उसे लाभदायक समझे तो अपनाये।
सहजकर्ता दिशा दिखाने की भूमिका नहीं करे, वरन वे एक अच्छे श्रोता की भूमिका अपनाये : व समस्या पहचान नियोजन की प्रक्रिया को सहज बनाये।
समुदाय की सुने और सीखे : एक समूह से सीखे और दूसरे समूह मे उस अनुभव को बाँटे व यदि वे उसे लाभदायक समझे तो अपनाये।
समूह को प्रेरित करे की एक अच्छे सहजकर्ता के क्या गुण होना चाहिये जैसे –
सभी सहभागियों के साथ अच्छा सम्बन्ध ।
सभी सदस्यों को चर्चा के लिये प्रेरित करें, केवल कुछ सदस्यों को प्रक्रिया पर हावी न होने दें।
समूह मे सभी सदस्यों की सूने व सीखे, स्थानीय शब्दों का प्रयोग करे जो सहभागी आसानी से समझ सके।
स्थानीय संस्कृति को ठीक से समझता हो।
प्रत्येक कक्षा के प्रारम्भ में निम्न कार्य करेंगें।
भागीदारों एवं समुदाय के अन्य सदस्यों के साथ अनोपचारिक बातचीत
भागीदारों को एक गोलाकार मे बैठने के लिये प्रेरित करे।
भागीदारों का स्वागत एवं आने के लिये धन्यवाद ज्ञापित करें
बैठक का उद्देश्य समझाना
प्राथमिकता प्राप्त रणनीतियों के क्रियान्वन की प्रगति का पुनरावलोकन
कक्षा की समाप्ति पर
कक्षा की सीख व अगली कक्षा की विषय-वस्तु का सारांश।
अगली कक्षा के लिये स्थान, दिनांक का समय तय करना।
सहभागियों को कक्षा से भागीदारी के लिये धन्यवाद देना व अगली कक्षा के लिये और अधिक लोगो को लाने के लिये प्रेरित करना।
सुनिश्चित करें कि सभी आवश्यक सूचनाऐं रजिस्टर मे लिखी गई हो।
समूह सदस्यों को चर्चा शुरु करने व चर्चा के लिये प्रेरित करें, कुछ उदाहरण -
कक्षा मे अपनी स्वत : प्रेरणा से भागीदारी करना।
एक दुसरे को व वृहत समुदाय को मदद करना।
अपने ज्ञान व अनुभव को दूसरों के साथ बांटना।
दूसरो की बात सुनना व उनकी राय को आदर देना।
अपने निर्णय स्वयं लेना एवं समस्या समाधान के लिये साथ-साथ काम करना।

सहभागी किसानों की भूमिका
किसान खेत पाठशाला में सहभागी किसानों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है। किसान खेत पाठशाला में सहभागी किसान अपने अनुभवों, ज्ञान और विचारों को एक दुसरे के साथ साझा कर सीखने-सीखाने का अवसर प्रदान करते हैं। दुसरे किसानो के अनुभवों से सीख लेकर उसे अपने खेत में अपनाते है और अन्य किसानों को प्रेरित करते हैं।
किसान पाठशाला में भाग लेने वाले किसानों को पोषण संवेदी खेती के विभिन्न सत्रों के माध्यम एवं नवाचारिक तकनीकों से अवगत होते है, और खेती किसानी से जुडी विभिन्न समस्याओं का व्यवहारिक हल प्राप्त करते है। इससे किसान सीखते हैं कि कैसे उनकी खेती में योजना बनानी चाहिए, किस तकनीक का उपयोग करना चाहिए, और कैसे वे अपनी खेती को जलवायु अनुकूल एवं जल हितेषी बना सकते है।
पोषण संवेदी खेती से सम्बंधित किसी भी गतिविधि के लिये केन्द्र बिन्दु किसान समूह रहेगा। सदस्य नियमित रुप से कक्षा मे भागीदारी करें और अन्य किसानों को भी प्रेरित करेंगे। क्योंकि सम्पूर्ण प्रक्रिया सामुदायिकता से जुड़ी है अतः यह आवश्यक है कि समूह सदस्य अपने क्षेत्र में रणनीति की जिम्मेदारी स्वयं लें। इसमे अन्य सरोकारियों के साथ तालमेल बिठाना भी आवश्यक है।
तालिका : 1 खेत पाठशाला की तालिका
क्र.सं. | कक्षा | कक्षा की विषय वस्तु | अभ्यास |
|---|---|---|---|
1 | कक्षा कुपोषण का आर्थिक-सामाजिक प्रभाव | 1.1 कुपोषण के आर्थिक प्रभाव | सभी सहभागी अपने अपने परिवार की आहार थाली का एक चित्र बनाकर आएगा अभ्यास को समझाने के लिए सहजकर्ता इस चित्र का उपयोग करेगा । |
2 | कक्षा हमारा खानपान, संतुलित पोषण एवं कुपोषण | 2.1 हमारा खानपान | स्थानीय खाद्य पदार्थों की पोषकता के बारे में जानकारी खोजना (जैसे उपलब्ध जंगली हरी सब्जियां, मूंगफली, या कोदो – कुटकी, साग, टिमरू) सदस्य अपना चार्ट तैयार कर साथ लाए (अगली कक्षा में संवाद करेंगे। |
3 | कक्षा पोषण के लिये स्थानीय संसाधन | 3.1 पोषक थाली की रूप रेखा एवं उनकी उपलब्धता का मार्ग तय करना | • गतिविधि पूर्ण होने के पश्चात् सदस्यों से चर्चा करे हांगणी खेती, कृषि वानिकी, फल उत्पादन, प्रसंस्करण, बीज हमारे खान-पान में पोषण को और कैसे सुरक्षित कर सकते है। |
4 | कक्षा पोषण आधारित खेती हेतु किये जाने वाले बदलाव | 4.1 पोषण संवेदी खेती स्थापित करना। | सभी सहभागियों को निर्देशित करेंगे कि वे अपनी हाँगणी खेती में किन किन फसलों को सम्मिलित करेंगे व उसके लिए बीज की व्यवस्था कहाँ से और कैसे करेंगे? इस विषय पर अपने परिवार व कृषक समूहों के साथ संवाद करे, आगामी कक्षा में कौनसे बीज की आवश्यकता होगी यह तय कर आवे। (रबी, खरीफ एवं जायद) |
5 | कक्षा फसल अवलोकन, पोषण एवं संरक्षण | 5.1 पोषण संवेदी खेती अपनाने का पंचांग तैयार करना | अगली कक्षा में आने के पूर्व अपनी फसल का अवलोकन करके आयेंगे द्य जिसका आधार होगा फसल की वृद्धी, रोग एवं कीट प्रकोप होगा। |
6 | कक्षा फसल अवलोकन, पोषण एवं संरक्षण | 6.1 पाठशाला खेतों के अवलोकन और अभ्यास कार्य | सहभागी अपने खेतों में फसल की स्थिति (वृद्धि, फूल, फल, कीट – प्रकोप, रोग) का अवलोकन करें और अगली बैठक में भ्रमण के लिए अपने खेत को प्रस्तावित करने हेतु 2-3 प्रमुख बिंदु नोट करें (उदाहरण : कोई विशेष समस्या, उल्लेखनीय वृद्धि, या जैविक उपाय का सफल प्रयोग)। |
7 | कक्षा फसल अवलोकन, उत्पाद, पोषण, एवं संरक्षण | 7.1 पाठशाला खेतों के अवलोकन और अभ्यास कार्य | लिये गए निर्णय और जिम्मेदारी अनुसार कीट प्रकोप से निपटने के उपाय कर अगली कक्षा में इसके परिणाम को साझा करेंगे और कक्षा से पूर्व खेतों में यदि कीट प्रकोप दिखाई दे तो इसके बारे में जानकारी लेकर आना है। |
8 | कक्षा फसल अवलोकन, उत्पाद, पोषण, एवं संरक्षण | 8.1 पाठशाला खेतों के अवलोकन और अभ्यास कार्य | लिये गए निर्णय और जिम्मेदारी अनुसार कीट प्रकोप से निपटने के उपाय कर अगली कक्षा में इसके परिणाम को साझा करेंगे और कक्षा से पूर्व खेतों में यदि कीट प्रकोप दिखाई दे तो इसके बारे में जानकारी लेकर आना है साथ ही अगली कक्षा का स्थान और समय तय करे। |
9 | कक्षा फसल अवलोकन, उत्पाद, पोषण, एवं संरक्षण | 9.1 पाठशाला खेतों के अवलोकन और अभ्यास कार्य | लिये गए निर्णय और जिम्मेदारी अनुसार कीट प्रकोप से निपटने के उपाय कर अगली कक्षा में इसके परिणाम को साझा करेंगे और कक्षा से पूर्व खेतों में यदि कीट प्रकोप दिखाई दे तो इसके बारे में जानकारी लेकर आना है साथ ही अगली कक्षा का स्थान और समय तय करे। |
10 | कक्षा रबी की फसल का अवलोकन, पोषण एवं संरक्षण | 10.1 पाठशाला खेतों के अवलोकन और अभ्यास कार्य | सहभागी अपने खेतों में फसल की स्थिति (वृद्धि, फूल, फल, कीट-प्रकोप, रोग) का अवलोकन करें और अगली बैठक में भ्रमण के लिए अपने खेत को प्रस्तावित करने हेतु 2-3 प्रमुख बिंदु नोट करें (उदाहरण : कोई विशेष समस्या, उल्लेखनीय वृद्धि, या जैविक उपाय का सफल प्रयोग)। |
11 | कक्षा फसल अवलोकन, उत्पाद, पोषण, एवं संरक्षण | 11.1 पाठशाला खेतों के अवलोकन और अभ्यास कार्य | अगली कक्षा में आने से पहले अभ्यास कार्य पर चर्चा करे। (इस कक्षा के लिए अभ्यास कार्य सदस्य स्वयं तय करेंगे) |
12 | कक्षा अपनायी गई खेती की पोषकता का विश्लेषण | 12.1 पोषण संवेदी खेती का उत्पादन विश्लेषण | लिये गए निर्णय और जिम्मेदारी अनुसार कीट प्रकोप से निपटने के उपाय कर अगली कक्षा में इसके परिणाम को साझा करेंगे और कक्षा से पूर्व खेतों में यदि कीट प्रकोप दिखाई दे तो इसके बारे में जानकारी लेकर आना है। |
कक्षा : 1 कुपोषण का आर्थिक - सामाजिक प्रभाव
उद्देश्य | समुदाय को कुपोषण के आर्थिक और सामाजिक प्रभावों की कहानी के माध्यम से जागरूक करना, ताकि वे इसके चक्र को तोड़ने और स्थानीय संसाधनों का उपयोग कर पोषण सुधारने की दिशा में प्रेरित हों। |
सामग्री | • फ्लेक्स चार्ट, चित्र कार्ड (कुपोषण के प्रभाव, स्वस्थ और अस्वस्थ परिवार की तस्वीरें), स्केच पेन, नोटबुक । |
प्रक्रिया/विधि | सहभागी सीख प्रक्रिया का उपयोग करते हुए, कहानी, समूह चर्चा, और चित्र-आधारित गतिविधियों के माध्यम से कुपोषण के प्रभावों को समझाया जाएगा। यह प्रक्रिया समुदाय की सांस्कृतिक और आर्थिक पृष्ठभूमि को ध्यान में रखेगी। |
अवधि | अवधि 2.5 से 3 घंटे |
सत्र : 1.1 कुपोषण के आर्थिक प्रभाव
सत्र के प्रारम्भ में सहजकर्ता सभी सहभागियों का अभिवादन कर कुशलक्षेम जानते है यह प्रश्न सहजकर्ता सहभागियों से करेगा की हमारे आस-पास कुपोषित व्यक्ति को कैसे पहचानते है जैसे हाथ पातरा पडजाय, ओदरो मोटो थाई जाय, हाथ घोल्या थाई जाय आदि।
सहजकर्ता कुपोषण के आंकड़ों पर भी चर्चा करे जैसे क्या हमारे परिवारों, फलो, गाँव में कुपोषित बच्चे, महिला एवं गडा सदस्य है क्या, क्या उनकी इस स्थिति का खान पान और खेती से कोई सम्बन्ध है?
सहभागियों से पूछा जाएगा : “आपके गाँव में कुपोषण के कारण किन समस्याओं का सामना करना पड़ता है?”
समूह बनाकर कुपोषण से होने वाली हानियों (जैसे, बीमारी, कम उत्पादकता, कर्ज) आर्थिक प्रभाव को समझाना एवं चार्ट बनाकर प्रस्तुतिकरण करना।
सत्र : 1.2 कुपोषण के कारण को समझना
कहानी का उदाहरण :
थावरी, जो जंगल के पास रहती थी, वन उत्पादों और स्थानीय फसलों से संतुलित आहार लेती थी। विवाह के बाद उसे पर्याप्त पोषण नहीं मिल पाया, जिसके कारण उसने कमजोर बच्चे को जन्म दिया। इस कहानी से यह समझ आता है कि कैसे स्थानीय संसाधनों की कमी और अल्पपोषण का चक्र जीवन को प्रभावित करता है।
सहभागियों को छोटे समूहों में बाँटकर अपने अनुभव साझा करने के लिए कहा जाएगा, जैसे कि कुपोषण के कारण उनके परिवार या गाँव में सामाजिक समस्याएँ।
चर्चा का समापन इस बात पर होगा कि पोषण-संवेदी खेती (जैसे, घरेलू बगीचे, विविध फसलें) सामाजिक एक जुटता और आत्मनिर्भरता को कैसे बढ़ा सकती है।
तालिका : 2 कुपोषण को समझाना
थावरी की खाद्य आदते स्वस्थ थी। | केवल अनाज था/सब्जी बहुत महंगी थी। | ऐसे खेत में काम करती थी जहाँ |
उसकी शादी गरीब परिवार में हुई हैं। | अच्छा भोजन और आराम नहीं मिलना। | थावरी कमजोर हो गई और जन्म देते समय मर गई |
उनका खेती से उत्पादन कम था, जमीन पडत थी। | थावरी गर्भवती हुई | जन्म के समय बच्चे का वजन कम था |
बीजों की उपलब्धता नहीं होना। | रासायनिक खाद के ज्यादा उपयोग से जमीन अनुपजाऊ हो गई थी। | बच्चा कुपोषित हो गया |
थावरी की कहानी से जोड़ते हुए कुपोषण का मुख्य कारण तक पहुंचना। थावरी की कहानी का उपयोग करते हुए कोई भी स्थिति लेकर सहभागियों को (क्यों, क्यों के प्रश्न के माध्यम ) से कुपोषण के कारणों को खोजने में मदद करेगा। जैसे – परिवार की आय कम है क्यों
उत्तर – अगर उत्तर यह आता है की रोजगार की कमी है” तब फिर प्रश्न बनेगा की, रोजगार की कमी क्यों हुई ?
स्थाई रोजगार की कमी -> परिवार की आय कम है। <- कृषि उत्पादन कम** **मानसिक रूप से कमजोर होना -> कुपोषित <- शारीरिक रूप से कमजोर
सत्र : 1.3 पोषण और कुपोषण का परिचय
हमने पिछले सत्र में देखा की कुपोषण कैसे पनपता है अब देखते है क्या क्या खाते है और उनका प्रभाव कैसे दिखता है।
पोषण सहजकर्ता स्थानीय आदिवासी समुदाय की खेती और खान-पान की प्रथाओं को ध्यान में रखते हुए चर्चा को आगे बढ़ाएंगे। सहजकर्ता पोस्टर और चित्र कार्ड्स का उपयोग कर पोषण के प्रमुख तत्वों (कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, विटामिन, खनिज) की व्याख्या करेंगे।
कुपोषण और अल्पपोषण के लक्षणों (जैसे कम वजन, स्टंटिंग, कमजोरी) को स्थानीय संदर्भ में समझाया जाएगा, जैसे बच्चों और महिलाओं में दिखने वाली समस्याएं।
सहभागियों के साथ समूह चर्चा और गतिविधियों के माध्यम से पोषण और कुपोषण के बीच संबंध समझाया जाएगा।
समूह से सवाल पूछे जाएंगे "आपके गांव में बच्चे या महिलाएं कमजोर क्यों दिखते हैं?” जवाबों को चार्ट पर नोट किया जाएगा।
सारांक्ष/सीख : कुपोषण से आर्थिक हानि (बीमारी, कर्ज, कम उत्पादकता) और सामाजिक समस्याएँ (कमजोर स्वास्थ्य, असमानता) उत्पन्न होती हैं। थावरी की कहानी से प्रेरित होकर, समुदाय स्थानीय संसाधनों, पोषण-संवेदी खेती, और सामूहिक प्रयासों से कुपोषण के चक्र को तोड़ सकता है, जिससे आत्मनिर्भरता और एकजुटता बढ़ेगी।
अभ्यास : सभी सहभागी अपने अपने परिवार की आहार थाली का एक चित्र बनाकर आएगा अभ्यास को समझाने के लिए सहजकर्ता इस चित्र का उपयोग करेगा।

कक्षा : 2 हमारा खानपान, संतुलित पोषण एवं कुपोषण
उद्देश्य | • सहभागियों को जलवायु परिवर्तन के प्रभावों और खेती की सक्षमता पर विचार करने के लिए प्रेरित करना। |
समय अवधि | अवधि 2.5 से 3 घंटे |
सामग्री | चित्र कार्ड, चार्ट पेपर, स्केच पेन, नोट बुक |
प्रक्रिया/विधि | सहभागी सीख प्रक्रिया का उपयोग करते हुए, कहानी, समूह चर्चा, और चित्र-आधारित गतिविधियों के माध्यम से जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को समझाया जाएगा। |
सत्र : 2.1 हमारा खानपान
पिछली कक्षा के अभ्यास कार्य पोषण थाली पर संवाद करे। संवाद के पश्चात् पिछले 3 दिनों के खान-पान को जाने।
समुदाय के खानपान को समझने के लिए उनके भोजन को जानना आवश्यक है। इसके लिये सहभागियों से पिछले तीन दिनों में खाए गए भोजन की सूची बनवाई जाएगी और इसे संतुलित आहार के साथ तुलना की जाएगी।
इसके लिए निम्न लिखित तालिका को एक चार्ट पेपर पर बना लेते हैं। कुल – उपस्थित सदस्यों में से अधिकांश सदस्यों द्वारा उपयोग पदार्थ का नाम ।
तालिका : 3 हमारा खान-पान
आओ जाने हमारे खानपान को | आज | पिछला कल | पिछला परसों |
|---|---|---|---|
अनाज (मक्का, चावल, ज्वार, गेहूँ, ) | |||
दाले एवं साबुत दलहन | |||
दूध-दही छाछ | |||
घी, तेल, मखन आदि | |||
भिण्डी, करेला, कद्दू, तुरई, | |||
ढीमडा, रजन, पालक, मैथी | |||
फल (केला, अमरुद, आम, पपीता टिमरू आदि) | |||
अंडा/मांस/मुर्गा/मटन आदि | |||
कंद (रतालू, शकरकंद, आलू) |
सत्र : 2.2 खाद्य समूह और पोषण का विश्लेषण
पिछले सत्र की चर्चा करते हुए सहजकर्ता फसल से पोषण को अपनी थाली में कैसे शामिल करे?
सत्र -1 में निश्चित किये गए अभ्यासों और उनमे की गई गतिविधियों से प्राप्त सीख, समूह के सदस्यों के बीच रखेंगे。
अब सहजकर्ता, सहभागी किसानो के साथ परिवार में खानपान सामग्री और हाँगणी खेती के माध्यम से उत्पन्न प्रत्येक फसल को उसके पोषण समूह के नजरिये से विश्लेषण करेंगे, इसके लिए निम्न चित्र की मदद लेते हैं। सभी फसल समूह की मात्रा के बारे बात करेगा। हम क्या सभी खान-पान समूह को शामिल कर रहे है।
खान-पान की सूची के अनुसार समूह की खाध्य सामग्री पर एक अभ्यास करते हैं और खाद्य समूह का पाई चार्ट तैयार करते हैं। में सहभागी किसानो से अंदाजा निकालने में मदद करेंगे, और उसका एक पाई-चित्र तैयार करते हैं। उत्पादन की जानकारी प्राप्त करने के बाद चार्ट पेपर पर एक पोषण थाली बनाते है और निम्नलिखित चित्र अनुसार फसल उत्पादन का सहभागी किसानो के साथ अवलोकन करेंगे।
इस सूची पर चर्चा करें -
इस जानकारी का विश्लेषण करने में सहजकर्ता समूह की मदद करे। चर्चा के लिए कुछ सवाल सदस्यों को सुझाए जैसे- हमारी थाली में कितने विविध प्रकार के खाद्य समूह का उपयोग कर रहे है।
सहजकर्ता निम्न बिन्दुओं को ध्यान में रखकर आगे बढ़ाएगा
हमारे परिवार में फल की मात्रा बहुत कम है/नगण्य
अनाज में विविधता नहीं है, सब्जियों में विविधता नहीं है।
हम पोषक पदार्थों का उपयोग क्यों कम कर रहे हैं? “जवाबों में बाजार निर्भरता, जागरूकता की कमी, या समय की कमी जैसे कारण सामने आएँगे।
परिवार में पहले कौन से खाद्य पदार्थ खाए जाते थे, जो अब कम हो गए हैं?
सत्र : 2.3 स्थानीय संसाधनों से संतुलित पोषण
सहभागियों को छोटे समूहों में बाँटकर एक "संतुलित थाली” डिजाइन करने को कहा जाएगा, जिसमें वे केवल स्थानीय और परंपरागत खाद्य पदार्थों का उपयोग करें।
चित्र संतुलित आहार के पाँच समूहों (अनाज, दालें, सब्जियाँ, फल, और प्रोटीन स्त्रोत) को समझाया जाएगा। (Go, Grow, Glow)
संतुलित थाली (मौसम के अनुसार - 3)
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वर्गीकरण के पश्चात् चर्चा का समापन इस बात पर होगा कि परंपरागत खानपान को पुनर्जनन कैसे किया जा सकता है, जैसे घरेलू बगीचे, सामुदायिक खेती, या जंगल संरक्षण।
समूह चर्चा में सहभागी अपनी परंपरागत रेसिपी (जैसे, रागी का हलवा, महुआ की चटनी) साझा करेंगे, और सहजकर्ता इनके पोषण मूल्य को फोकस करेंगे।
सभी सहभागी अपनी मौसमी संतुलित आहार थाली के परमपरागत स्वरूप को पुनर्जीवित करने एवं पोषक बनाने अपने पियर समूह के साथ चर्चाकरे एवं डायरी लिखेंगे।
परिवारिक स्तर की पोषण बनवाना (मौसम के अनुसार)
सर्दी | गर्मी | बरसात | |
|---|---|---|---|
उपजाते है एवं खाते | मक्का, गेहूँ, चना, चावल | ||
उपजाते है पर खाते नहीं | सोयाबीन, कपास | ||
खाते है पर उपजाते नहीं | आलू, गोभी, केला, संतरा | ||
महंगा है इसलिए नहीं खाते | अंगूर, सेब | ||
उपजाते नहीं है इसलिए खाते नहीं है | अदरक, धनिया, पोदिना | ||
जानते नहीं है इसलिए नहीं खाते | रागी, कांग, राजगीरा |
इस अभ्यास के लिए सहजकर्ता सहभागियों के साथ चर्चा करता, क्या हमारी खेती और खानपान में मजबूत सम्बध है?
क्या हम जो उगाते वह सभी प्रकार उपज खाते है?
क्या जो हम खाते है मुख्यत : बाजार से आता है?
क्या ऐसे उपज है जो महँगी होने के कारण एवं स्वयं नहीं उपजाने के कारण हम नहीं खा पाते है?
क्या हमारी आय का अधिकतर हिस्सा भोजन सामग्री पर खर्च होता है?
क्या उपरोक्त सूचि में ऐसे पदार्थ है जिन्हें हम स्वयं उपजा सकते है?
सारांश/सीख : आज की कक्षा में पोषण, कुपोषण और संतुलित आहार पर चर्चा हुई। सहभागियों ने स्थानीय खान-पान की तुलना संतुलित आहार से की, कुपोषण के लक्षण समझे और स्थानीय संसाधनों से पोषक भोजन की संभावनाएँ तलाशीं जाएगी। सभी को अगली कक्षा के लिए अभ्यास कार्य दिए गए।
अभ्यास : स्थानीय खाद्य पदार्थों की पोषकता के बारे में जानकारी खोजना (जैसे उपलब्ध जंगली हरी सब्जियां, मूंगफली या कोदो – कुटकी, साग, टिमरू) सदस्य अपना चार्ट तैयार कर साथ लाए (अगली कक्षा में संवाद करेंगे।)
कक्षा : 3 पोषण के लिए स्थानीय संसाधन
उद्देश्य | संतुलित पोषण और खाद्य विविधता के महत्व को स्थापित करके परंपरागत खानपान प्रोत्साहित करना, उनका पोषणिक व आर्थिक लाभों पर चर्चा करना, तथा स्थानीय खाद्य पदार्थों का उपयोग कर स्वस्थ और टिकाऊ जीवनशैली के लिए योजना बनाना। |
समय अवधि | अवधि 2 घण्टे 30 मीनट से 3 घंटे |
सामग्री | • फ्लेक्स चार्ट, स्केच पेन, नोटबुक, रंगीन चॉक। |
प्रक्रिया/विधि | सहभागी सीख प्रक्रिया का उपयोग कर समूह चर्चा, कहानी, गतिविधियाँ, और प्रदर्शन के माध्यम से हाँगणी और पोषण के महत्व को समझाया जाएगा। यह प्रक्रिया हमारे समुदायों की परंपराओं, मौसमी चक्रों और स्थानीय संसाधनों पर आधारित होगी। |
सत्र : 3.1 पोषक थाली की रूपरेखा एवं उनकी उपलब्धता मार्ग तय करना
सत्रारंभ में सहजकर्ता सभी सहभागियों का अभिवादन कर कुशलक्षेम जानते है, फिर खाद्य पदार्थों की पोषकता के बारे में जानकारी एवं पारिवारिक स्तर की पोषण थाली की चर्चा को जोड़ते हुए सदस्य समूह में संवाद करे की हमारे भोजन में क्या क्या शामिल है। साथ ही देखे की हमारे भोजन में कितनी विविधता है। गतिविधि एक की पोषण थाली के आधार पर चर्चा शुरू करते हुए सदस्यों से जाने की क्या सभी भोजन सामग्री हमेशा उपलब्ध रहती है। जैसे-क्या हमारे पोषक समूह के खाद्य पदार्थ सभी मौसम में उपलब्ध हो पाते है, अगर नहीं तो उसके लिए हम कौनसे तरीके अपना सकते है जैसे हरी सब्जी, फल या कोई विशेष फसल। चर्चा के बाद बताए की क्या हम लिस्ट तैयार कर सकते है कब कौनसी भोजन सामग्री उपलब्ध रहती है और हम हमारी थाली में उनको शामिल करते है।
खेती और खान-पान पर में क्या सम्बन्ध है? क्या, कैसे, क्यों, कब
पोषण के लिए हाँगणी खेती करना क्यों जरुरी है?
हांगणी खेती से आर्थिक लाभ क्या है?
हम पौष्टिक फसलें कम क्यों उगाते हैं?
इन सवालों को 4 समूह में दे और आपस में चर्चा के बाद चार्ट पेपर पर लिख कर प्रस्तुतिकरण करवाए।
हाँगणी के पोषणिक एवं आर्थिक लाभ पर संवाद करें।
सत्र : 3.2 संतुलित पोषण के लिए स्थानीय समाधान एवं नियोजन
आओ विचार करे संतुलित पोषण को कैसे बढ़ावा दे सकते हैं?
सहभागियों को छोटे समूहों में बाँटकर एक गतिविधि दी जाएगी, जिसमें वे स्थानीय खाद्य पदार्थों (जैसे, रागी, मक्का, मूँग, चौलाई, महुआ) का उपयोग कर एक चार्ट तैयार करें।
तालिका : 4 पोषण के स्थानीय समाधान
क्र.सं. | बदलाव सूची | बदलाव के लिये किये जाने वाले कार्य ( जैसे हांगणी, पोषणवाड़ी, फलदार पौधे प्रसंस्करण, बीज संग्रहण |
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सामान्य चर्चा के बाद 4 समूह में विभाजित कर पोषणवाड़ी का मॉडल तैयार करवाए और चर्चा करें।
पोषण वाड़ी लगाने की रूप रेखा।
पोषण वाड़ी का आकर क्या होगा।
पौधे, सब्जियां, फल, कंद एवं औषधीय पौधे कितने और कैसे लगायेंगे।
प्रत्येक समूह अपनी अपनी पोषण वाड़ी मॉडल का प्रस्तुतीकरण करेंगे।
पोषण वाड़ी के मॉडल पर चर्चा, धूप, छाया, हवा का प्रभाव एवं पानी की व्यवस्था पर चर्चा करना।
चर्चा करते हुए निर्णय ले की कौन-कौन सा मॉडल अपनाएँगे।

निर्णय एवं चर्चा के बाद तय करे की पोषण संवेदी खेती के नजरिय से क्या क्या अपनाने वाले है। योजना बनाकर साझा करें। जैसे हांगणी खेती, फल उधान, सब्जी वाड़ी, औषधीय पौधे लगना आदि।
संवाद को सवालों के साथ शुरू करें जैसे -
हमारे क्षेत्र में पाई जाने वाली हांगणी खेती का सामान्य चित्र बनाना एवं चर्चा (हांगणी का नक्शा एवं समझाना) एवं निर्णय लेना।
सारांश/सीख : स्थानीय समुदाय को संतुलित पोषण और खाद्य विविधता के लिए जागरूक किया गया। परंपरागत खानपान, मौसमी खाद्य उपलब्धता, और हांगणी खेती के पोषणिक-आर्थिक लाभों पर चर्चा हुई। स्थानीय संसाधनों (रागी, चौलाई) से स्वस्थ, टिकाऊ जीवनशैली के लिए चर्चा गई।
अभ्यास कार्य : गतिविधि पूर्ण होने के पश्चात् सदस्यों से चर्चा करे हांगणी खेती, कृषि वानिकी, फल उत्पादन, प्रसंस्करण, बीज हमारे खान-पान में कैसे और पोषण को कैसे सुरक्षित कर सकते है। चर्चा के पश्चात् हांगणी खेती, कृषि वानिकी, फल उत्पादन, प्रसंस्करण, बीज संग्रहण आदि की योजना बनाकर लाने को कहे, जो हम अपनाने वाले है।
तालिका : 5 आओ पोषण को अपनाएँ
घटक | अपनाये जाने वाले कार्य |
|---|---|
कृषि वानिकी | |
फल उत्पादन | |
प्रसंस्करण | |
बीज संग्रहण | |
हांगणी खेती |
कक्षा : 4 पोषण आधारित खेती हेतु किये जाने वाले बदलाव
उद्देश्य | • पोषण आधारित खेती के लिए आवश्यक बदलावों को समझाना। |
समय अवधि | अवधि 2.5 से 3 घंटे |
सामग्री | फ्लेक्स चार्ट, स्केच पेन, नोटबुक, रंगीन चॉक। |
प्रक्रिया/विधि | सहभागी सीख प्रक्रिया का उपयोग कर समूह चर्चा, गतिविधियाँ, प्रदर्शन, और कहानियों के माध्यम से पोषण आधारित खेती को समझाया जाएगा। यह प्रक्रिया समुदायों की परंपराओं, मौसमी चक्रों, और स्थानीय संसाधनों पर आधारित होगी। |
सत्र : 4.1 पोषण संवेदी खेती स्थापित करना
सत्र के प्रारम्भ में सहजकर्ता सभी सहभागियों का अभिवादन कर कुशलक्षेम जानते है।
पिछले सत्र में दिए गए अभ्यास कार्य पर चर्चा करते हुए जाने की हांगणी खेती, कृषि वानिकी, फल उत्पादन, प्रसंस्करण, बीज संग्रहण कैसे पोषण को बढ़ाने में कैसे मदद करेंगे?
चर्चा से जोड़ते हुए पूछे की क्या पोषण वाड़ी लगना आवश्यक है, अगर हाँ तो क्यों ?
पोषण वाड़ी से क्या लाभ होगा और कैसे ?
पोषण वाड़ी का उद्देश्य सिर्फ घर के लिए उपयोग है? आप क्या सोचते है।
आप अपनी वाड़ी पोषण के लिए कौनसे पौधे लगना चाहते है।
आओ जाने और बनाए खेती-मौसम के अनुसार फल, सब्जियां उगाने की सूची।
तालिका : 6 मौसम के अनुसार पोषण को अपनाएँ
फल | सब्जियां | कंद | साग | औषधिय पौधे |
|---|---|---|---|---|
उनके अवलोकन से प्राप्त विचारो को जोड़ते हुए सहभागी किसानो से प्रश्न पूछेंगे कि क्या आपको लगता है कि हाँगणी खेती से प्राप्त उत्पाद हमारे परिवार की पोषण की आवश्यकताओं को पूर्ण करती है?
यदि सहभागी किसान अपना उत्तर "नहीं" में देते है तो ऐसी क्या फसले है जो हांगणी खेती में जोड़ी जा सकती है? उसकी सूचि बनाते है।
ऐसी कौन सी फसल है जो वर्तमान परिदृश्य में हटाने की आवश्यकता है? उसकी सूचि बनाते है।
सत्र : 4.2 पोषण संवेदी खेती में खाद्यान फसल उत्पादन हेतु नियोजन
सत्र-1 की पोषण संवेदी खेती-मौसम के अनुसार फल, सब्जियां उगाने की सूची से जोड़ते हुए फसल नियोजन पर चर्चा को आगे बढ़ाये।
कितने क्षेत्रफल में हांगणी खेती पुनः स्थापित करेंगे, उसमे कौन-कौन सी फसल लगायेंगे?
फसल लगाने के लिए किसके पास कितना बीज उपलब्ध है? यदि बीज उपलब्ध नहीं है तो कितने प्रकार के और कितनी मात्रा में परंपरागत देशी बीज की आवश्यकता होगी? आवश्यक बीज कहाँ से प्राप्त करेंगे?
सहजकर्ता सहभागी किसानो के साथ समूह के साथ खेत के आकार और खेती के नियोजन पर चर्चा आरम्भ करता है जिसका मुख्य उद्देश्य फसल मिश्रण एवं खेत में लगाने की रुपरेखा, तैयार करना सभी सहभागियों को “हाँगणी खेती पुर्नस्थापना कार्य-पुस्तिका” देकर उसके विषय में चर्चा करवाते हैं।
तालिका : 7 फसल उत्पादन हेतु नियोजन
फसल उत्पादन नियोजन | रबी | खरीफ | जायद |
|---|---|---|---|
क्या क्या फसल को अपनाएंगे | |||
बीज कहा से आयेंगे | |||
खाद किस प्रकार का होगा | |||
पानी की व्यवस्था कैसे होगी |
सारांश एवं सीख : उपरोक्त गतिविधि से सहभागी किसानों में समझ बनी कि हाँगणी खेती से परिवार की खाद्य एवं पोषण सुरक्षा पूर्ण होती है तथा आय सृजित होती है। यह खेती खाद्य एवं पोषण से भरपूर होने के साथ ही पर्यावरण हितेषी भी है।
अभ्यास कार्य : सभी सहभागियों को निर्देशित करेंगे कि वे अपनी हाँगरी खेती में किन किन फसलों को सम्मिलित करेंगे एवं उसके लिए बीज की व्यवस्था कहाँ से और कैसे करेंगे? इस विषय पर अपने परिवार एवं कृषक समूहों के साथ संवाद करे एवं आगामी कक्षा में कौन-कौन से बीज की आवश्यकता होगी यह तय कर आए। (रबी, खरीफ एवं जायद)
कक्षा : 5 फसल अवलोकन, पोषण एवं संरक्षण
उद्देश्य | फसल अवलोकन के आधार पर पोषण एवं संरक्षण विधियों का प्रयोग |
समय अवधि | अवधि 2 से 3 घंटे |
सामग्री | चार्ट पेपर, स्केच पेन, किसान खेत पाठशाला रजिस्टर, कीट पोस्टर। |
प्रक्रिया/विधि | सहभागी सीख प्रक्रिया, समूह संवाद, गतिविधियाँ, प्रदर्शन एवं दोहराव के माध्यम से |
सत्र : 5.1 पोषण संवेदी खेती अपनाने का पंचांग तैयार करना
पोषण संवेदी खेती का आधार तैयार करना
पोषण संवेदी खेती को जानना
खाद्य समूह पोषण संवेदी खेती
पोषण संवेदी खेती की चुनौतियाँ
पोषण संवेदी खेती की योजना एवं खांका तैयार करना
खाद्यान समूह मिश्रण
खेती की रूपरेखा
बीज प्रबंधन एवं पौध तैयारी
मिट्टी पोषणःमानव पोषण
पोषण संवेदी खेती क्रियान्वन खरीफ पूर्व
ग्रीष्मकालीन जुताई
खाद तैयार करना और खेत में डालना
बीजोपचार
मृदा एवं जल संरक्षण
पोषण संवेदी खेती क्रियान्वन खरीफ के दौरान
आंकलन, निंदाई गुराई
आंकलन, कीट नियंत्रण
आंकलन, उत्पाद प्राप्ति
आंकलन, उत्पाद मूल्य संवर्धन
पोषण संवेदी खेती क्रियान्वन, रबी पूर्व
ग्रीष्मकालीन जुताई
खाद तैयार करना और खेत में डालना
बीजोपचार
मृदा एवं जल संरक्षण
पोषण संवेदी खेती क्रियान्वन, रबी दौरान
आंकलन, निंदाई गुराई
आंकलन, कीट नियंत्रण
आंकलन, उत्पाद प्राप्ति
आंकलन, उत्पाद मूल्य संवर्धन
पोषण संवेदी खेती विश्लेषण
उत्पादन, पोषण विश्लेषण, सीख
पुनरावलोकन
सत्र के प्रारम्भ में सहजकर्ता सभी सहभागियों का अभिवादन कर कुशलक्षेम जानते है।
सहजकर्ता प्रश्न पूछे की क्या हम पोषण संवेदी खेती को अपनाने के लिए पंचांग तैयार कर सकते है?
पंचांग में क्या क्या विषय शामिल करना जरुरी है और क्यों? आओ तैयार करें।
सत्र : 5.2 पोषण संवेदी खेती में शस्य क्रिया, उत्पादन एवं रिकॉर्ड का कैलेंडर
सहजकर्ता सभी सहभागी किसानों के साथ समूह में चर्चा प्रारंभ करेंगे।
शस्य क्रियाओं की कार्य-योजना तैयार करना (पखवाडा/माहवार)। इस हेतु निम्नलिखित तालिका को ध्यान में रख कर योजना बना सकते के अनुसार लिखेंगे और उसके महत्त्व पर संवाद करेंगे।
शस्यक्रिया | पहला - मई | दूसरा - मई | पहला - जून | दूसरा - जून | पहला - जुलाई | दूसरा - जुलाई | पहला - अगस्त | दूसरा - अगस्त | पहला - सितम्बर | दूसरा - सितम्बर | अक्टूबर | नवम्बर | दिसम्बर |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
भूमि की तैयारी जुताई करें | |||||||||||||
गोबर खाद फैलाना | |||||||||||||
रोप तैयार करनाःधान, रागी, मिर्च | |||||||||||||
बीज का चयन व उपचार | |||||||||||||
बीज बुवाई | |||||||||||||
निराई गुड़ाई करना | |||||||||||||
खाद एवं निराई गुढ़ाई | |||||||||||||
पौध संरक्षण करना | |||||||||||||
कीट नियंत्रण |
सारांक्ष : उक्त कक्षा से सहभागी किसानों में पोषण संवेदी खेती के अंतर्गत की जाने वाली विभिन्न शस्य क्रियाओं और उनके करने से होने वाले लाभ के बारे में समझ बनी।
सत्र : 5.3 पोषण संवेदी खेती हेतु उन्नत पौध तैयार करना
सत्र आरंभ : पोषण संवेदी खेती में शस्यक्रिया, उत्पादन से जोड़ते हुए चर्चा करे की किस माह में पोषण वाड़ी के लिए कौन कौन सी पौध तैयार कर सकते है?
उन्नत पौध तैयार करना क्यों जरुरी है क्यों जरुरी है? कैसे करेंगे
अब हम अपनी पोषण वाड़ी में क्या क्या नए पौधे लगा सकते है और कैसे ?
उन्नत पौध के आर्थिक एवं पोषणिक लाभों पर संवाद करें।
कब क्या-क्या उगा सकते है चर्चा करें।
नर्सरी का उद्देश्य सिर्फ घर के लिए उपयोग है? या और आप क्या सोचते है।
आप अपनी नर्सरी में कौनसे पौधे लगना चाहते है।
समूह के सदस्य कौन कौन से पौधे लगना चाहते है एवं प्रसार की विधियाँ (बीज, गुट्टी बाधना, कलम लगना, गांठ लाना, अंकुरे तैयार करना आदि (समूह द्वारा पोध उत्पादन की कार्य, लगाने की विधि तैयारी करना।
सहजकर्ता सहभागियों से पेड पौधो के रोप तैयार करने के तरीके जैस बीज, डाली, की सूचि तैयार करवाए।
प्रकार | बीजद्वारा | पौध तैयार करना | गांठ द्वारा | कमल द्वारा |
|---|---|---|---|---|
फसल | चना | प्याज | हल्दी | आम |
फल | अमरूद | महुआ | केला | टिंडोरी |
सब्जी | सेमफली | टमाटर | रतालु |
इस उदहारण के आधार चर्चा करते हुए फसलों के बारे जाने एवं प्रेरित करे।
चर्चा में तय करे की 3 से ज्यादा फल, औषधीय पौधे, हांगणी आधा बीघा, सब्जी वाड़ी में 7 से 8 प्रकार और सीमित स्थान पर लगाएंगे।
पोषण संवेदी खेती को मजबूत करने के लिए क्या तरीके अपनाएंगे और कौन-कौन से घटक होंगे।
सारांक्ष एवं सीख : पांचवीं कक्षा में पोषण संवेदी खेती के लिए विविध फसलों, स्थानीय बीज संरक्षण, और जैविक खाद (कम्पोस्ट, केंचुआ खाद) के महत्व को समझा। पोषण वाड़ी मॉडल निर्माण, संतुलित फसल पोषण, और उन्नत पौध तैयार करने की प्रक्रिया सीखी। पारंपरिक और आधुनिक विधियों से बीज भंडारण, मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने, और टिकाऊ खेती को बढ़ावा देने की रणनीति बनी, जिससे समुदाय में पोषण सुरक्षा सुनिश्चित होगी।
अभ्यास : अगली कक्षा में आने के पूर्व अपनी फसल का अवलोकन करके आयेंगे। जिसका आधार होगा फसल की वृद्धी, रोग एवं कीट प्रकोप होगा।
कक्षा : 6 फसल अवलोकन, पोषण एवं संरक्षण
उद्देश्य | फसल अवलोकन के आधार पर पोषण एवं संरक्षण विधियों का प्रयोग |
समय अवधि | अवधि 2 से 3 घंटे |
सामग्री | चार्ट पेपर, स्केच पेन, किसान खेत पाठशाला रजिस्टर, कीट पोस्टर। |
प्रक्रिया/विधि | सहभागी सीख प्रक्रिया, समूह संवाद, गतिविधियाँ, प्रदर्शन एवं दोहराव के माध्यम से |
सहजकर्ता सभी सहभागियों का कक्षा में स्वागत करता/करती है, औपचारिक कुशलक्षेम जानता है, यदि पूर्व में किसी सहभागी के साथ कोई चर्चा लायक बिन्दु हो तो उसको सामने लाकर सीख के लिए उपयुक्त वातावरण निर्माण करते हैं। अब पिछली कक्षा के बाद से सभी सहभागियों की फसल एवं खेती के बारे में चर्चा करते हैं। फसल में आये बदलाव (वृद्धि, रोग, कीट-प्रकोप, आदि) के बारे में सभी साथी अपने-अपने अनुभव रखते जाते हैं। सभी सहभागी पोषण संवेदी खेती में मिलने वाले उत्पादनों के आंकड़े चर्चा में लाते हैं जैसे, सब्जी, शाक, पशुओं का चारा, औषधि, आदि। इन आंकड़ो को सहभागी अपनी किसान डायरी में अंकित करते हैं। सहभागियों ने फसल की निंदाई-गुड़ाई कब-कब और कैसे की, उनसे उन्हें क्या-क्या प्राप्त हुआ, कितना प्राप्त हुआ और उसका क्या किया, पशुपालन में, पोषण में, बाजार में बेचकर आय में ?
जब सभी सहभागी अपने 15 दिन के अवलोकन साझा कर चुके, फिर सभी सहभागी आपस में संवाद कर यह तय करेंगे कि आज किन-किन खेतों का भ्रमण लाभप्रद होगा और सीखने के लिए महत्वपूर्ण है। जब खेत में भ्रमण के लिए जाते हैं, तो अवलोकन के मुख्य बिन्दुय फसलवार पौध वृद्धि, पट्टी, कलि, फूल, फल, उत्पादनय कीटप्रकोप, फसल विशेष के रोग, संबंधी आदि। भ्रमण के पश्चात किसी स्थान पर बेठकर अवलोकनों (पौध वृद्धि, कीट संबंधी, रोग संबंधी आदि) पर उनके कारकों और प्रभावों पर चर्चा करते हुवे। और यदि कोई समस्या है तो उसे हल करने के लिए क्या उपाय/तकनीक का अनुपालन करना चाहिए, इस प्रक्रिया में सन्दर्भ सामग्री का उपयोग करके सहजकर्ता उनका मार्गदर्शन करें।
यदि किसी फसल में कोई कीट-प्रकोप अधिक मात्रा में पाया जाता है और कोई नैसर्गिक (सामान्य) शत्रु जीव उपलब्ध नहीं है तो सन्दर्भ क्रमांक-में दिये गये तालिका के अनुसार जैविक प्रयोग का अभ्यास भी निश्चित करते हैं। कक्षा में यह भी निर्धारित किया जायेगा कि अगली कक्षा कब और कहाँ आयोजित की जावेगी। कक्षा के दौरान कौन से उपाय/तकनीक का प्रदर्शन किया जावेगा परम्परागत रसोई विधियाँ व उनके लाभों पर चर्चा करवाना जैसे पहले खाना किस किस प्रकार के बर्तन में बनाया जाता था, उनका क्या लाभ था, क्या उन्हें पुनः अपनाया जा सकता है? समूह सदस्य किसी विशेष पकवान बनाने की विधि पर भी चर्चा करें तो उपयोगी होगा।
सारांक्ष एवं सीख : सहभागियों ने फसल अवलोकन, कीट-प्रकोप, रोग, और पोषण संवेदी खेती के उत्पादों पर चर्चा की। किसान डायरी में आंकड़े अंकित किए गए। खेत भ्रमण से पौध वृद्धि, कीट-रोग के कारणों-प्रभावों का विश्लेषण हुआ। जैविक उपायों का अभ्यास तय किया गया। परंपरागत रसोई विधियों के लाभों पर संवाद हुआ। अगली बैठक के लिए स्थान, समय, और तकनीकी प्रदर्शन तय किए गए, जिससे सामुदायिक सीख और सहयोग को बढ़ावा मिला।
अभ्यास कार्य : सहभागी अपने खेतों में फसल की स्थिति (वृद्धि, फूल, फल, कीट-प्रकोप, रोग) का अवलोकन करें और अगली बैठक में भ्रमण के लिए अपने खेत को प्रस्तावित करने हेतु 2-3 प्रमुख बिंदु नोट करें (उदाहरण : कोई विशेष समस्या, उल्लेखनीय वृद्धि, या जैविक उपाय का सफल प्रयोग)।
कक्षा : 7 फसल अवलोकन, उत्पाद, पोषण एवं संरक्षण
उद्देश्य | अवलोकन के आधार पर पोषण उत्पाद का रिकार्ड, अंतरवर्ती शस्य क्रियाएँ स्थापित करना। कीट-प्रकोप या रोग नियंत्रण पर चर्चा एवं कार्य-योजना |
समय अवधि | अवधि 2 से 3 घंटे |
सामग्री | चार्ट पेपर, स्केच पेन, किसान खेत पाठशाला रजिस्टर, कीट पोस्टर। |
प्रक्रिया/विधि | सहभागी सीख प्रक्रिया, समूह संवाद, गतिविधियाँ, प्रदर्शन एवं दोहराव के माध्यम से |
सहजकर्ता सभी सहभागियों का कक्षा में स्वागत करता/करती है, औपचारिक कुशलक्षेम जानता है, यदि पूर्व में किसी सहभागी के साथ कोई चर्चा लायक बिन्दु हो तो उसको सामने लाकर सीख के लिए उपयुक्त वातावरण निर्माण करते हैं।
अब पिछली कक्षा के बाद से सभी सहभागियों की फसल एवं खेती के बारे में चर्चा करते हैं। फसल में आये बदलाव (वृद्धि, रोग, कीट-प्रकोप, आदि) के बारे में सभी साथी अपने-अपने अनुभव रखते जाते हैं। सभी सहभागी पोषण संवेदी खेती में मिलने वाले उत्पादनों के आंकड़े चर्चा में लाते हैं जैसे सब्जी, शाक, पशुओं का चारा, औषधि, आदि। इन आंकड़ो को सहभागी अपनी किसान डायरी में अंकित करते हैं। जब खेत में भ्रमण के लिए जाते हैं, तो अवलोकन के मुख्य बिन्दु : फसलवार पौध वृद्धि, पट्टी, कलि, फूल, फल, उत्पादनय कीटप्रकोप, फसल विशेष के रोग, संबंधी आदि।
तालिका : 8 आओं अवलोकन करें और जानें
आंकलन का घटक | अवलोकन के बिन्दु | किसी फसल या पेड़ की उपज यदी कोई है तो (जानकारी) |
|---|---|---|
फलदार पौधे | ||
हाँगणी | ||
पोषण वाड़ी | ||
औषधीय पौधे | ||
यदि किसी फसल में कोई कीट-प्रकोप अधिक मात्रा में पाया जाता है और कोई नैसर्गिक (सामान्य) शत्रु जीव उपलब्ध नहीं है तो सन्दर्भ क्रमांक – में दिये गये तालिका के अनुसार जैविक प्रयोग का अभ्यास भी निश्चित करते हैं।
कीट प्रबंधन की योजना पर चर्चा करे, जो रोग एवं प्रकोप देखे गए उन्हें कैसे रोके।
सदस्यों से बात करे की पहले बुजर्ग (अधिक उम्र वाले ) क्या क्या उपाय करते थे। उन उपायों पर चर्चा करते हुए प्रबंधन के तरीके निकाले।
तालिका : 9 आओं समझें कीटों से नुकसान को
किसान का नाम | फसल का नाम | किट का नाम व प्रकार | किट व्याधि का स्थान (तना, पत्ती) | एक वर्ग मीटर में किट संख्या |
|---|---|---|---|---|
जीवा भाई | टमाटर | इल्ली | तना | 15 |
अमरूद का पौधा | सफेद मक्खी | पत्तों पर सफेद धब्बे | 120 | |
भ्रमण के पश्च्यात किसी स्थान पर बैठकर अवलोकनों (पौध वृद्धि, कीट संबंधी, रोग संबंधी आदि) पर उनके कारकों और प्रभावों पर चर्चा करते हुवे। और यदि कोई समस्या है तो उसे हल करने के लिए क्या उपाय/तकनीक का अनुपालन करना चाहिए, इस प्रक्रिया में सन्दर्भ सामग्री का उपयोग करके सहजकर्ता उनका मार्गदर्शन करे।
चर्चा के पश्चात् प्रबंधन की विधियों पर चर्चा करे कैसे प्रकोप से बचा जा सकता है फिर हमारे द्वारा तैयार की जाने वाली दवाइयों जैसे – दशपर्णी, पक्षियों के माध्यम, नीमासत्र, ब्रह्मास्त्र आदि से फसलों मे कीट नियन्त्रण करना।
सामुहिक सीख एवं चर्चा के बाद तय करेंगे की क्या करेंगे, सन्दर्भ सामग्री का उपयोग करना और योजना निर्माण वृद्धि एवं फसल के बचाव पर योजना नाम के साथ दवाई उपयोग और किसके घर क्या बनाना है, कौन सदस्य किसी को क्या तैयार करने के बाद देगा।
अगली कक्षा में आने से पहले अभ्यास कार्य पर चर्चा करें।
कक्षा में यह भी निर्धारित किया जायेगा कि अगली कक्षा कब और कहाँ आयोजित की जावेगी। तथा कक्षा के दौरान कौन से उपाय/तकनीक का प्रदर्शन किया जावेगा।
सभी सदस्यों को कक्षा की सीख पर चर्चा करे एवं समापन करें।
सारांश एवं सीख : कक्षा में फसल अवलोकन के आधार पर कीट प्रकोप (इल्ली, सफेद मक्खी) और रोगों की पहचान की। समूह चर्चा, चार्ट निर्माण, और खेत में फसल वृद्धि, पोषण, और संरक्षण विधियाँ सीखीं। पारंपरिक उपायों (दशपर्णी, नीमासत्र, ब्रह्मास्त्र) और जैविक कीट नियंत्रण पर चर्चा हुई। सामूहिक सीख से कीट प्रबंधन योजना बनी, जिसमें जिम्मेदारियाँ सौंपी गईं, ताकि पोषण संवेदी खेती को बढ़ावा मिले।
अभ्यास : लिये गए निर्णय और जिम्मेदारी अनुसार कीट प्रकोप से निपटने के उपाय कर अगली कक्षा में इसके परिणाम को साझा करेंगे और कक्षा से पूर्व खेतों में यदि कीट प्रकोप दिखाई दे तो इसके बारे में जानकारी लेकर आना है साथ ही अगली कक्षा का स्थान और समय तय करे।
कक्षा : 8 फसल अवलोकन, उत्पाद पोषण एवं संरक्षण
उद्देश्य | अवलोकन के आधार पर पोषण उत्पाद का रिकार्ड, अंतरवर्ती शस्य क्रियाएँ स्थापित करना। कीट-प्रकोप या रोग नियंत्रण पर चर्चा एवं कार्य-योजना। |
समय अवधि | अवधि 2 से 3 घंटे |
सामग्री | चार्ट पेपर, स्केच पेन, किसान खेत पाठशाला रजिस्टर, कीट पोस्टर। |
प्रक्रिया/विधि | सहभागी सीख प्रक्रिया, समूह संवाद, गतिविधियाँ, प्रदर्शन एवं दोहराव के माध्यम से |
सत्र : 8.1 पाठशाला खेतों के अवलोकन और अभ्यास कार्य
सहजकर्ता सभी सहभागियों का कक्षा में स्वागत करता / करती है, औपचारिक कुशलक्षेम जानता है, यदि पूर्व में किसी सहभागी के साथ कोई चर्चा लायक बिन्दु हो तो उसको सामने लाकर सीख के लिए उपयुक्त वातावरण निर्माण करते हैं।
अब पिछली कक्षा के बाद से सभी सहभागियों की फसल एवं खेती के बारे में चर्चा करते हैं। फसल में आये बदलाव (वृद्धि, रोग, कीट-प्रकोप, आदि) के बारे में सभी साथी अपने-अपने अनुभव रखते जाते हैं।
सभी सहभागी पोषण संवेदी खेती में मिलने वाले उत्पादनों के आंकड़े चर्चा में लाते हैं जैसे, सब्जी, शाक, पशुओं का चारा, औषधि, आदि। इन आंकड़ो को सहभागी अपनी किसान डायरी में अंकित करें।
जब खेत में भ्रमण के लिए जाते हैं, तो अवलोकन के मुख्य बिन्दु, फसलवार पौध वृद्धि, पट्टी, कलि, फूल, फल, उत्पादन, कीटप्रकोप, फसल विशेष के रोग, संबंधी आदि।
तालिका : 10 आओं जाने कीट प्रकोप
आंकलन का घटक | अवलोकन के बिन्दु | किसी फसल या पेड़ की उपज यदी कोई है तो (जानकारी) |
|---|---|---|
फलदार पौधे | ||
हांगणी | ||
पोषणवाड़ी | ||
औषधीय पौधे |
यदि किसी फसल में कोई कीट-प्रकोप अधिक मात्रा में पाया जाता है और कोई नैसर्गिक (सामान्य) शत्रु जीव उपलब्ध नहीं है तो सन्दर्भ क्रमांक : में दिये गये तालिका के अनुसार जैविक प्रयोग का अभ्यास भी निश्चित करते हैं।
कीट प्रबंधन की योजना पर चर्चा करे, जो रोग एवं प्रकोप देखे गए उन्हें कैसे रोके।
सदस्यों से बात करे की पहले बुजर्ग (अधिक उम्र वाले ) क्या क्या उपाय करते थे। उन उपायों पर चर्चा करते हुए प्रबंधन के तरीके निकाले।
तालिका : 11 कीट प्रकोप के उपायों को जानें
किसान का नाम | फसल का नाम | किट का नाम व प्रकार | किटव्याधि का स्थान (तना, पत्ती) | एक वर्ग मीटर में किट संख्या |
|---|---|---|---|---|
जीवा भाई | टमाटर | इल्ली | तना | 15 |
अमरूद का पौधा | सफेद मक्खी | पत्तों पर सफेद धब्बे | 120 |
भ्रमण के पश्च्यात् किसी स्थान पर बैठकर अवलोकनों (पौध वृद्धि, कीट संबंधी, रोग संबंधी आदि) पर उनके कारकों और प्रभावों पर चर्चा करते हुवे। और यदि कोई समस्या है तो उसे हल करने के लिए क्या उपाय/तकनीक का अनुपालन करना चाहिए, इस प्रक्रिया में सन्दर्भ सामग्री का उपयोग करके सहजकर्ता उनका मार्गदर्शन करे।
चर्चा के पश्चात् प्रबंधन की विधियों पर चर्चा करे कैसे प्रकोप से बचा जा सकता है फिर हमारे द्वारा तैयार की जाने वाली दवाइयों जैसे – दशपर्णी, पक्षियों के माध्यम, नीमासत्र, ब्रह्मास्त्र आदि से फसलों मे कीट नियन्त्रण करना।
सामुहित सीख एवं चर्चा के बाद तय करेंगे की क्या करेंगे, सन्दर्भ सामग्री का उपयोग करना और योजना निर्माण वृद्धि एवं फसल के बचाव पर योजना नाम के साथ दवाई उपयोग और किसके घर क्या बनाना है, कौन सदस्य किसी को क्या तैयार करने के बाद देगा।
अगली कक्षा में आने से पहले अभ्यास कार्य पर चर्चा करे।
सत्र : 8.2 रबी की फसल को पोषण संवेदी बनाने की योजना
अब चूँकि खरीफ की फसल का अंतिम चरण चल रहा है, सहजकर्ता सभी सहभागियों के बीच रबी की फसल के नियोजन के विषय पर चर्चा का आरम्भ करता है। चर्चा का मुख्य बिन्दु होता है
हमारे कितने खेतों में कितनी नमी उपलब्ध है?
कुओं, नदियों नालों, तालाब, नहर से कितना पानी मिल पायेगा?
इस उपलब्ध पानी का हम सर्वश्रेष्ठ उपयोग किस प्रकार कर पाएंगे?
अपनी पोषण थाली को बनाये रखने के लिए क्या फसल मिश्रण होना चाहिए?
बसन्त ऋतु तक उत्पादन के लिए सिंचाई प्रबंधन के कौन-कौन से तरीके लाभकारी होंगे?
सत्र के अंत में सीख एवं चर्चा के बाद तय करेंगे की क्या-क्या अभ्यास घर से करके लायेंगे, सन्दर्भ सामग्री का उपयोग करना और योजना निर्माण वृधि एवं फसल के बचाव पर योजना नाम के साथ दवाई उपयोग और किसके घर क्या बनाना है, कौन सदस्य किसी को क्या तैयार करने के बाद देगा।
सभी सहभागी अपने-अपने परिवार की खाद्य आवश्यकता को ध्यान में रखकर फसल मिश्रण, मात्रा एवं प्रजातियों का चयन करना, बीज की उपलब्धता सुनिश्चित करना।
पोषण एवं स्वास्थ्य वाटिका में लगाये जाने वाली सब्जियों, साग, फलों के लिए पौधे, एवं बीज तैयार करना।
कक्षा में यह भी निर्धारित किया जायेगा कि अगली कक्षा कब और कहाँ आयोजित की जावेगी। तथा कक्षा के दौरान कौन से उपाय/तकनीक का प्रदर्शन किया जावेगा।
सारांश एवं सीख : कक्षा में फसल अवलोकन के आधार पर कीट प्रकोप (इल्ली, सफेद मक्खी) और रोगों की पहचान की। समूह चर्चा, चार्ट निर्माण, और खेत में फसल वृद्धि, पोषण, और संरक्षण विधियाँ सीखीं। पारंपरिक उपायों (दशपर्णी, नीमासत्र, ब्रह्मास्त्र) और जैविक कीट नियंत्रण पर चर्चा हुई। सामूहिक सीख से कीट प्रबंधन योजना बनी, जिसमें जिम्मेदारियाँ सौंपी गईं, ताकि पोषण संवेदी खेती को बढ़ावा मिले।
अभ्यास : लिये गए निर्णय और जिम्मेदारी अनुसार कीट प्रकोप से निपटने के उपाय कर अगली कक्षा में इसके परिणाम को साझा करेंगे और कक्षा से पूर्व खेतों में यदि कीट प्रकोप दिखाई दे तो इसके बारे में जानकारी लेकर आना है साथ ही अगली कक्षा का स्थान और समय तय करे।
कक्षा : 9 फसल अवलोकन, उत्पाद, पोषण एवं संरक्षण
उद्देश्य | अवलोकन के आधार पर पोषण उत्पाद का रिकार्ड, अंतरवर्ती शस्य क्रियाएँ स्थापित करना। कीट-प्रकोप या रोग नियंत्रण पर चर्चा एवं कार्य-योजना। |
समय अवधि | अवधि 2 से 3 घंटे |
सामग्री | चार्ट पेपर, स्केच पेन, किसान खेत पाठशाला रजिस्टर, कीट पोस्टर। |
प्रक्रिया/विधि | सहभागी सीख प्रक्रिया, समूह संवाद, गतिविधियाँ, प्रदर्शन एवं दोहराव के माध्यम से |
सत्र : 9.1 पाठशाला खेतों के अवलोकन और अभ्यास कार्य
सहजकर्ता सभी सहभागियों का कक्षा में स्वागत करता/करती है, औपचारिक कुशलक्षेम जानता है, यदि पूर्व में किसी सहभागी के साथ कोई चर्चा लायक बिन्दु हो तो उसको सामने लाकर सीख के लिए उपयुक्त वातावरण निर्माण करते हैं।
अब पिछली कक्षा के बाद से सभी सहभागियों की फसल एवं खेती के बारे में चर्चा करते हैं। फसल में आये बदलाव (वृद्धि, रोग, कीट-प्रकोप, आदि) के बारे में सभी साथी अपने-अपने अनुभव रखते जाते हैं।
सभी सहभागी पोषण संवेदी खेती में मिलने वाले उत्पादनों के आंकड़े चर्चा में लाते हैं जैसे, सब्जी, शाक, पशुओं का चारा, औषधि, आदि। इन आंकड़ो को सहभागी अपनी किसान डायरी में अंकित करते हैं।
जैसे की किसान खेत पाठशाला अब अंतिम दौर में है, तो सहभागियों के साथ पोषण-सवेंदी खेती से सम्बंधित सीख को संश्लेषित करने का समय है, और साथ ही आगामी वर्ष के लिए बीज एकत्रित करना और खेती को और अधित पोषण संवेदी बनाने का समय है।
अतः सहजकर्ता सभी सहभागियों के साथ बीज चयन, बीज भण्डारण, और संरक्षण विधियों पर पुनः चर्चा को दोहरा देते हैं। जैसे मिट्टी के घड़े, बाँस की टोकरियाँ, या नीम की पत्तियों के साथ भंडारण।
आपस में बीज लेन-देन और बीज बैंक की स्थापना, जैविक-विधियों से पौधों का प्रसारण आदि पर चर्चा कर अभ्यास सुनिश्चित करते हैं की सभी सदस्य कौन-कौन से बीज एकत्रित करेंगे और किन-किन तरीकों को अपनाएंगे। इसके लिए सन्दर्भ सामग्री में दिये गए विधियों को चर्चा के लिए उपयोग में लिया जा सकता है।
रबी के योजना अनुसार खेत की तैयारी, खाद की उपलब्धता निश्चित करना, बीजोपचार, एवं खेत की तैयारी पर चर्चा की जावेगी एवं निर्णय साझा किये जावेंगे।
सत्र : 9.2 सुखमणी/प्रसंस्करण
सुखमणी क्या होती है और किस तरह तैयार कर सकते है। सुखमणी किस-किस की की जा सकती है (फल, सब्जियां, साग आदि) चर्चा करना। समूह अपने अनुभवों को साझा करें की सुखमणी के क्या लाभ हो सकते है?
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सुखमणी/प्रसंस्करण कीय जाने वाले फल सब्जियों की सूची तैयार करना
तालिका : 12 सुखमणी के तरीके एवं लाभ
फल/सब्जियां | प्रसंस्करण करने का तरीका | पोषणिक लाभ |
|---|---|---|
दी गई सूचि के आधार पर सुखमणी/प्रसंस्करण के पोषणिक लाभों पर चर्चा करना।
सारांश एवं सीख : अंत में सहजकर्ता सभी सदस्यों को कक्षा में फसल अवलोकन के आधार पर कीट प्रकोप (इल्ली, सफेद मक्खी) और रोगों की पहचान की। समूह चर्चा, चार्ट निर्माण, और खेत में फसल वृद्धि, पोषण, और संरक्षण विधियाँ सीखीं। पारंपरिक उपायों (दशपर्णी, नीमासत्र, ब्रह्मास्त्र) और जैविक कीट नियंत्रण पर चर्चा हुई। सामूहिक सीख से कीट प्रबंधन योजना बनी, जिसमें जिम्मेदारियाँ सौंपी गईं, ताकि पोषण संवेदी खेती को बढ़ावा मिले।
अगली कक्षा में आने से पहले अभ्यास कार्य पर चर्चा करे।
कक्षा में यह भी निर्धारित किया जायेगा कि अगली कक्षा कब और कहाँ आयोजित की जावेगी। तथा कक्षा के दौरान कौन से उपाय/तकनीक का प्रदर्शन किया जावेगा।
अभ्यास : लिये गए निर्णय और जिम्मेदारी अनुसार कीट प्रकोप से निपटने के उपाय कर अगली कक्षा में इसके परिणाम को साझा करेंगे और कक्षा से पूर्व खेतों में यदि कीट प्रकोप दिखाई दे तो इसके बारे में जानकारी लेकर आना है साथ ही अगली कक्षा का स्थान और समय तय करे।
कक्षा : 10 रबी की फसल का अवलोकन, पोषण एवं संरक्षण
उद्देश्य | फसल अवलोकन के आधार पर पोषण एवं संरक्षण विधियों का प्रयोग |
समय अवधि | अवधि 2 से 3 घंटे |
सामग्री | चार्ट पेपर, स्केच पेन, किसान खेत पाठशाला रजिस्टर, कीट पोस्टर। |
प्रक्रिया/विधि | सहभागी सीख प्रक्रिया, समूह संवाद, गतिविधियाँ, प्रदर्शन एवं दोहराव के माध्यम से |
सहजकर्ता सभी सहभागियों का कक्षा में स्वागत करता/करती है, औपचारिक कुशलक्षेम जानता है, यदि पूर्व में किसी सहभागी के साथ कोई चर्चा लायक बिन्दु हो तो उसको सामने लाकर सीख के लिए उपयुक्त वातावरण निर्माण करते हैं।
अब पिछली कक्षा के बाद से सभी सहभागियों की फसल एवं खेती के बारे में चर्चा करते हैं। फसल में आये बदलाव (वृद्धि, रोग, कीट-प्रकोप, आदि) के बारे में सभी साथी अपने-अपने अनुभव रखते जाते हैं। सभी सहभागी पोषण संवेदी खेती में मिलने वाले उत्पादनों के आंकड़े चर्चा में लाते हैं जैसे सब्जी, शाक, पशुओं का चारा, औषधि, आदि। इन आंकड़ो को सहभागी अपनी किसान डायरी में अंकित करते हैं। सहभागियों ने फसल की निंदाई-गुड़ाई कब-कब और कैसे की, उनसे उन्हें क्या-क्या प्राप्त हुआ, कितना प्राप्त हुआ और उसका क्या किया, पशुपालन में, पोषण में, बाजार में बेचकर आय में?
जब सभी सहभागी अपने 15 दिन के अवलोकन साझा कर चुके, फिर सभी सहभागी आपस में संवाद कर यह तय करेंगे कि आज किन-किन खेतों का भ्रमण लाभप्रद होगा और सीखने के लिए महत्वपूर्ण है। जब खेत में भ्रमण के लिए जाते हैं, तो अवलोकन के मुख्य बिन्दु फसलवार पौध वृद्धि, पट्टी, कली, फूल, फल, उत्पादन कीटप्रकोप, फसल विशेष के रोग, संबंधी आदि। भ्रमण के पश्च्यात् किसी स्थान पर बैठकर अवलोकनों (पौध वृद्धि, कीट संबंधी, रोग संबंधी आदि) पर उनके कारकों और प्रभावों पर चर्चा करते हुवे। और यदि कोई समस्या है तो उसे हल करने के लिए क्या उपाय/तकनीक का अनुपालन करना चाहिए, इस प्रक्रिया में सन्दर्भ सामग्री का उपयोग करके सहजकर्ता उनका मार्गदर्शन करें।
यदि किसी फसल में कोई कीट-प्रकोप अधिक मात्रा में पाया जाता है और कोई नैसर्गिक (सामान्य) शत्रु जीव उपलब्ध नहीं है तो सन्दर्भ क्रमांक : में दिये गये तालिका के अनुसार जैविक प्रयोग का अभ्यास भी निश्चित करते हैं। कक्षा में यह भी निर्धारित किया जायेगा कि अगली कक्षा कब और कहाँ आयोजित की जावेगी। तथा कक्षा के दौरान कौन से उपाय/तकनीक का प्रदर्शन किया जावेगा। परम्परागत रसोई विधियाँ और उनके लाभों पर चर्चा करवाना जैसे पहले खाना किस किस प्रकार के बर्तन में बनाया जाता था, उनका क्या लाभ था, क्या उन्हें पुनः अपनाया जा सकता है?
समूह सदस्य किसी विशेष पकवान बनाने की विधि पर भी चर्चा करें तो उपयोगी होगा।
सारांश एवं सीख : सहभागियों ने फसल अवलोकन, कीट-प्रकोप, रोग, और पोषण संवेदी खेती के उत्पादों पर चर्चा की। किसान डायरी में आंकड़े अंकित किए गए। खेत भ्रमण से पौध वृद्धि, कीट-रोग के कारणों-प्रभावों का विश्लेषण हुआ। जैविक उपायों का अभ्यास तय किया गया। परंपरागत रसोई विधियों के लाभों पर संवाद हुआ। अगली बैठक के लिए स्थान, समय, और तकनीकी प्रदर्शन तय किए गए, जिससे सामुदायिक सीख और सहयोग को बढ़ावा मिला।
अभ्यास : सहभागी अपने खेतों में फसल की स्थिति (वृद्धि, फूल, फल, कीट-प्रकोप, रोग) का अवलोकन करें और अगली बैठक में भ्रमण के लिए अपने खेत को प्रस्तावित करने हेतु 2-3 प्रमुख बिंदु नोट करें (उदाहरण : कोई विशेष समस्या, उल्लेखनीय वृद्धि या जैविक उपाय का सफल प्रयोग।)
कक्षा : 11 फसल अवलोकन, उत्पाद, पोषण एवं संरक्षण
उद्देश्य | अवलोकन के आधार पर पोषण उत्पाद का रिकार्ड, अंतरवर्ती शस्य क्रियाएँ स्थापित करना। कीट-प्रकोप या रोग नियंत्रण पर चर्चा एवं कार्य-योजना। |
समय अवधि | अवधि 2 से 3 घंटे |
सामग्री | चार्ट पेपर, स्केच पेन, किसान खेत पाठशाला रजिस्टर, कीट पोस्टर। |
प्रक्रिया/विधि | सहभागी सीख प्रक्रिया, समूह संवाद, गतिविधियाँ, प्रदर्शन एवं दोहराव के माध्यम से |
सहजकर्ता सभी सहभागियों का कक्षा में स्वागत करता/करती है, औपचारिक कुशलक्षेम जानता है, यदि पूर्व में किसी सहभागी के साथ कोई चर्चा लायक बिन्दु हो तो उसको सामने लाकर सीख के लिए उपयुक्त वातावरण निर्माण करते हैं।
अब पिछली कक्षा के बाद से सभी सहभागियों की फसल एवं खेती के बारे में चर्चा करते हैं। फसल में आये बदलाव (वृद्धि, रोग, कीट-प्रकोप, आदि) के बारे में सभी साथी अपने-अपने अनुभव रखते जाते हैं।
सभी सहभागी पोषण संवेदी खेती में मिलने वाले उत्पादनों के आंकड़े चर्चा में लाते हैं जैसे, सब्जी, शाक, पशुओं का चारा, औषधि, आदिद्य इन आंकड़ो को सहभागी अपनी किसान डायरी में अंकित करे।
जब खेत में भ्रमण के लिए जाते हैं, तो अवलोकन के मुख्य बिन्दु, फसलवार पौध वृद्धि, पट्टी, कलि, फूल, फल, उत्पादन, कीटप्रकोप, फसल विशेष के रोग, संबंधी आदि।
तालिका : 13 फसल उत्पादन, पोषण एवं संरक्षण
आंकलन का घटक | अवलोकन के बिन्दु | किसी फसल या पेड़ की उपज यदी कोई है तो (जानकारी) |
|---|---|---|
फलदार पौधे | ||
हांगणी | ||
पोषण वाड़ी | ||
औषधीय पौधे | ||
यदि किसी फसल में कोई कीट-प्रकोप अधिक मात्रा में पाया जाता है और कोई नैसर्गिक (सामान्य) शत्रु जीव उपलब्ध नहीं है तो सन्दर्भ क्रमांक : में दिये गये तालिका के अनुसार जैविक प्रयोग का अभ्यास भी निश्चित करते हैं।
कीट प्रबंधन की योजना पर चर्चा करे, जो रोग एवं प्रकोप देखे गए उन्हें कैसे रोके।
सदस्यों से बात करे की पहले बुजर्ग (अधिक उम्र वाले) क्या-क्या उपाय करते थे। उन उपायों पर चर्चा कर प्रबंधन के तरीके निकाले।
तालिका : 14 आओं जाने फसल प्रबंधन के उपाय
किसान का नाम | फसल का नाम | किट का नाम व प्रकार | किट व्याधि का स्थान (तना, पत्ती) | एक वर्ग मीटर में किट संख्या |
|---|---|---|---|---|
जीवा भाई | टमाटर | इल्ली | तना | 15 |
अमरूद का पौधा | सफेद मक्खी | पत्तों पर सफेद धब्बे | 120 | |
रकमा भाई | भिण्डी | इल्ली | तना | 8 |
जामुन का पौधा | सफेद मक्खी | पत्तों पर सफेद धब्बे | 98 | |
भ्रमण के पश्च्यात किसी स्थान पर बैठकर अवलोकनों (पौध वृद्धि, कीट संबंधी, रोग संबंधी आदि) पर उनके कारकों और प्रभावों पर चर्चा करते हुवे द्य और यदि कोई समस्या है तो उसे हल करने के लिए क्या उपाय/तकनीक का अनुपालन करना चाहिए, इस प्रक्रिया में सन्दर्भ सामग्री का उपयोग करके सहजकर्ता उनका मार्गदर्शन करे।
चर्चा के पश्चात प्रबंधन की विधियों पर चर्चा करे कैसे प्रकोप से बचा जा सकता है फिर हमारे द्वारा तैयार की जाने वाली दवाइयों जैसे – दशपर्णी, पक्षियों के माध्यम, नीमास्त्र, ब्रह्मास्त्र आदि से फसलों मे कीट नियन्त्रण करना।
सामुहित सीख एवं चर्चा के बाद तय करेंगे की क्या करेंगे, सन्दर्भ सामग्री का उपयोग करना और योजना निर्माण वृद्धि एवं फसल के बचाव पर योजना नाम के साथ दवाई उपयोग और किसके घर क्या बनाना है, कौन सदस्य किसी को क्या तैयार करने के बाद देगा।
अगली कक्षा में आने से पहले अभ्यास कार्य पर चर्चा करें।
कक्षा : 12 अपनायी गई खेती की पोषकता का विश्लेषण
उद्देश्य | सहभागी किसानो को हांगणी खेती का आर्थिक विश्लेषण करने की समझ बनाना। |
समय अवधि | अवधि 3 घंटे |
सामग्री | चार्ट पेपर, मार्कर। |
प्रक्रिया/विधि | समूह चर्चा, फिल्ड आधारित कार्य, संवादात्मक । |
सत्र : 12.1 पोषण संवेदी खेती का उत्पादन विश्लेषण
सहजकर्ता सभी सहभागियों को आज की कक्षा का उद्देश्य बताते हुए उनका स्वागत करता है। तत्पश्चात चर्चा के माध्यम से पांचवी कक्षा में मिली सीख का पुनवलोकन करवाता है। एवं यह सुनिश्चित करता है कि सभी बिंदु कवर हो सके।
तालिका : 15 आओं करें पोषण संवेदी खेती का विश्लेषण
खाद्यान्न समूह | स्वयं से उत्पादित साम्रगी | समूह सदस्यों से लेकर | ग्राम से | बाजार से खरीद कर |
|---|---|---|---|---|
सत्र : 12.2 किसान खेत पाठशाला से प्राप्त सीख एवं सुझाव
इस सत्र में सहजकर्ता : उपस्थित सहभागी किसानो से चर्चा करे तथा किसानो को सभी कक्षा एवं सत्र की याद दिलाकर इस पाठशाला अभ्यास से उन्होंने क्या सीखा एवं पाठशाला को बेहतर बनाने के लिए उनके सुझाव अनिवार्य रूप से प्रपत्र अनुसार दस्तावेजीकरण करें।
तालिका : 16 आपकी सीख को जानें
किसान का नाम | मुख्य सीख 1 | मुख्य सीख 2 | सुझाव |
|---|---|---|---|
सहजकर्ता सभी सहभागियों का हाँगणी खेती पुर्नस्थापना खेत-पाठशाला की अंतिम कक्षा में सभी सहभागियों का स्वागत करते हैं, और औपचारिक कुशलक्षेम जानने के बाद, सभी सहभागियों से पाठशाला के अनुभव कैसे लगे? व्यक्तिगत रूप से इस पाठशाला से जुड़ने को "Mood Meter" के चार्ट पर दर्शाने के लिए कहता है।
Mood Meter
![]() बहुत अच्छा | ![]() अच्छा | ![]() ठीक ठाक | ![]() खराब | ![]() बहुत खराब |
|---|---|---|---|---|
संदर्भ सामग्री
कक्षा : 3 हाँगणी खेती अन्तर्गत मिट्टी-पोषण प्रबंधन
तालिका : 17 मिट्टी पोषण को समझे
बनाने की विधी | चर्चा के बिन्दु | |
|---|---|---|
केंचुआ खाद | केंचुआ खाद सर्वोत्तम खाद में से एक है। पहले हमारे खेतो में कई केंचुए प्राकृतिक रूप से पाए जाते थे परन्तु लगातार रासायनिक कीटनाशक और उर्वरको के प्रयोग से यह खत्म होते जा रहे है। केंचुआ, किसान का सर्वोत्तम मित्र है जो खेत की मृदा में उपस्थित जैविक कचरे को खाकर खाद के रूप में परिवर्तित करता है साथ ही मृदा को लगातार पलट कर उसे मुलायम बना देता है जिससे मृदा में वायु का प्रवाह बढ़ जाता है। | सबसे पहले कचरे या अपशिष्ट से खाद तैयार की जाना है उसमे से कांच, पत्थर, पोलीथिन हो उसे अलग कर लेते हैं। उसे अलग ढेर बनाकर आधा अपघटित होने तक रखते है। भूमि के ऊपर बेड तैयार करें, बेड को लकड़ी की सहायता से पीटकर पक्का व समतल बना लें। इस तह पर 6-7 से.मी. (3-3 इंच) मोटी बालू रेत या बजरी की तह बिछायें। बालू रेत की इस तह पर 6 इंच मोटी दोमट मिट्टी की तह बिछायें। दोमट मिट्टी न मिलने पर काली मिट्टी में पत्थर की खदान का बारीक चूरा मिलाकर बिछायें। इस पर आसानी से अपघटित हो सकने वाले कृषि अपशिष्ट पदार्थ जैसे नारीयल की बूछ, मक्का, बाजरा या ज्वार के पत्ते और डंठल की दो इंच मोटी सतह बनाये । इसके ऊपर 3-3 इंच पकी हुई गोबर खाद डाले। केचुँओं को डालने के उपरान्त इसके ऊपर गोबर, पत्तीया, कृषि अपशिष्ट आदि की 6 से 8 इंच की सतह बनाये । अब इसे मोटी टाट् पट्टी से ढांक दे । झारे की सहायता से टाट पट्टी पर आवश्यकतानुसार प्रतिदिन पानी छिड़कते रहे, ताकि 45 से 50 प्रतिशत नमी बनी रहे। ध्यान रखे कि अधिक नमी या गीलापन नहीं हो ऐसा होने पर हवा अवरूद्ध हो जाती है और सूक्ष्म जीवाणु तथा केचुएं ठीक से कार्य नहीं कर पाते है और केचुएं मर भी सकते है। इस बेड के ऊपर छाया की व्यवस्था करे क्यूंकि अधिक तापमान होने पर केंचुए मर सकते है, बेड का तापमान 35 से 30 डिग्री सेन्टीग्रेड होना चाहिए। बेड में गोबर की खाद कड़क हो गयी हो या ढेले बन गये हो तो इसे हाथ से तोड़ते रहे तथा सप्ताह में एक बार बेड का कचरा पलट दे । 30 दिन बाद छोटे छोटे केंचुए दिखना शुरू हो जाते है । हर सप्ताह दो बार कूड़े-कचरे की तह पर तह बिछाएं। बॉयोमास की तह पर पानी छिड़क कर नम कर। 43 दिन बाद पानी छिड़कना बंद कर दें। डेढ़ माह में खाद बनकर तैयार हो जाता है यह चाय की पत्ती सा दिखता है तथा मिट्टी के समान सोंधी गंध होती है। केंचुआ खाद को छानकर केंचुओ को अलग कर ले तथा फिर से उपरोक्त प्रक्रिया को दोहरायें। इस प्रकार हर 45 से 50 दिन में खाद तैयार हो जाती है। |
जीवामृत | 10 किलोग्राम देशी गाय का गोबर, गोमूत्र, गुड या फलों के गूदों की चटनी, 3 किलो बेसन, 300 लीटर पानी और 50 ग्राम मिट्टी। | कोई टंकी लें, उसमे 300 लीटर पानी ड़ालें। 10 किलोग्राम गाय का गोबर, 8 से 10 लीटर गोमूत्र व 3 किलोग्राम गुड़ या फलों की चटनी मिलाएँ। इसके बाद 3 किलोग्राम बेसन, 50 ग्राम मेड़ की मिट्टी डालें और सभी को डण्डे से मिलाए। इसके बाद टंकी को जालीदार कपड़े से बंद कर दे । 48 घण्टे में चार बार डण्डे से चलाए और जीवामृत 48 घंटे बाद तैयार हो जाएगा। जीवामृत का प्रयोग केवल सात दिनों तक कर सकते हैं। |
मटका खाद | देशी गाय का 10 लीटर गोमूत्र, 10 किलोग्राम ताजा गोबर, आधा किलोग्राम गुड़, आधा किलो चने का बेसन इत्यादि। | सभी को अच्छे से मिलाकर 1 बड़े मटके में भरकर 5-7 दिन तक सड़ाते है। इससे उत्तम जीवाणु कल्चर तैयार होता है। मटका खाद को 300 लीटर पानी में घोलकर किसी भी फसल में गीली या नमीयुक्त जमीन में फसलों की कतारों के बीच में अच्छी तरह से प्रति एकड़ छिड़काव करें। हर 15 दिन बाद इस क्रिया को दोहराएं। मटका खाद का प्रयोग करने से फसल भी अच्छी होती है, पैदावार भी बढ़ती है। |
कक्षा : 4 बीज भण्डारण के परम्परागत तरीके
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कक्षा : 5 बीज संरक्षण के स्थानीय तरीके
तालिका : 18 आओं जाने बीज संरक्षण के विभिन्न तरीकें
कबला | गेंहूं, ज्वार, मक्का, धान, बाजरा, आदि अनाज |
मटके में संग्रहण | विभिन्न प्रकार की दालें जैसे उड़द, मुंग, चना, तुअर, झालर, तिलहन |
साबुत फल को लटकाकर | लोकी, तुरई, झुमकी आदि। |
सुखी लोकी के खोल में रखकर फलीदार सब्जियां | बेंगन, लोबिया |
सरसों और अरंडी के तेल का प्रयोग | |
प्याज और लहसुन | |
कंद फसलों के बीज के लिये | अदरक, हल्दी, अरबी आदि। |
सागवान या टिक के पत्ते पर बीजों को चिपकाकर | जिन बीजों के साथ चिकनाई होती है जैसे टमाटर, ककड़ी आदि। |
सत्र : 5.2 नमी संरक्षण हेतु की जाने वाली अंतशस्य क्रियाएं
फसलों को स्वस्थ रखने और खेत में नमी बनाये रखने के लिए निराई- गुड़ाई बहुत ही महत्वपूर्ण है। निराई गुड़ाई से पौधों की कतारों के बीच उगने वाले अवांछित खरपतवारों इत्यादि को खेत से बाहर करते है। समय समय पर निराई गुढ़ाई करने से निम्नलिखित लाभ होते है :
फसलों में लगातार निराई गुड़ाई करते रहने से फसल की देखभाल अच्छी हो जाती है साथ ही फसल स्वस्थ एवं उत्पादन अधिक होता है।
निराई गुड़ाई से खेतों में हवा का संचार बना रहता है जिससे पौधे के जड़ों की वृधि और विकास अच्छी हो जाती है, फल स्वरुप पौधा अच्छी मिट्टी पकड़ के साथ भूमि में खड़ा रहता है।
लगातार समय-समय पर निराई गुड़ाई करते रहने से पोषक तत्व तथा जैविक खाद मिट्टी में अच्छी तरह से मिल जाते हैं जिससे पोषक तत्व पौधे को आसानी से उपलब्ध हो जाता है।
मृदा में हवा के संचार के साथ- साथ लाभदायक एरोबिक बैक्टीरिया की सक्रियता बढ़ जाती है जिससे अधिक मात्रा में पोषक तत्व पौधों को उपलब्ध हो पाता है।
फसलों में निराई गुड़ाई करते रहने से खर-पतवार तथा अन्य वह्य तत्व से मिट्टी प्रभावित नहीं होती और फसल बिना किसी तनाव एवं दबाव से अपनी वृद्धि विकास कर सकेंगे।
निराई गुड़ाई से प्रकाश का संचार भी भरपूर हो जाता है जिससे हानिकारक मृदा जनक रोग अत्यधिक नहीं पनपते हैं।
निराई गुड़ाई करने से सूक्ष्म जीवो की सक्रियता पौधों की जड़ों के पास बनी रहती है जिससे जटिल से जटिल यौगिक मृदा जल में आ जाते हैं जिनका अवशोषण पौधों के द्वारा आसानी से कर लिया जाता है।

पौध से पौध के मध्य निश्चित अन्तराल हेतु थिन्निंग करना :
खेत में सभी पौधों की ठीक से वृद्धि हो इस हेतु छटनी की जाती है जिसमे पौधों से पौधों के बीच पर्याप्त दुरी रखने के लिए हाथो से पास पास में उग आये पौधों को निकाल कर पर्याप्त दुरी पर लगाते है। इस प्रक्रिया को थिन्निंग कहते है। इस प्रक्रिया का यह लाभ होता है कि पर्याप्त दुरी होने पर सभी पौधों को पर्याप्त मात्रा में सूर्य का प्रकाश, हवा, नमी एवं मृदा से पोषण की प्राप्ति होती है जिससे पौधों का विकास एक समान होता है। पौधों के मध्य पर्याप्त दुरी रखने से पौधों की वृद्धि अच्छे से होती है।
कक्षा : 8 कीट प्रकोप नियंत्रण विधियाँ
तालिका : 19 कीट नियंत्रण विधियों को समझे
आवश्यक सामाग्री | बनाने की विधी | चर्चा के बिन्दु | |
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नीमास्त्र : | 5 किलो नीम की पत्तियां, 5 किलोग्राम नीम फल/नीम्बोली, 5 लीटर गोमूत्र, 1 किलोग्राम गाय का गोबर | सर्वप्रथम नीम की पत्तियों को पत्थर की मदद से चटनी बना लें, इसको एक पात्र में रख ले और निम्बोली को कूट लें। गोमूत्र एवं गोबर डालें। इस सामग्री को 8-10 घन्टे के अंतराल पर डंडे से चलाकर कपड़े से ढकदें। 48 घंटे में तैयार हो जाएगा । | नीमास्त्र का प्रयोग छः माह तक कर सकते है । इसे छाये में रखना चाहिए । गोमूत्रः प्लास्टिक बर्तन में रखें 100 लीटर पानी में तैयार नीमास्त्र को छान कर मिलाएं और स्प्रे पम्प से फसलों पर छिड़काव करें। |
ब्रह्मास्त्र : | 10 लीटर गोमूत्र, 3 किलो नीम की पत्ती, 2-2 किलो करंज, सीताफल, बेल, अरंडी, धतूरा के पत्तों की चटनी | पांच पत्तियों के मिश्रण को गोमूत्र के साथ मिट्टी के बर्तन में डाल कर उबालते है। तीन से चार उबाली के बाद उतारकर इस सामग्री 48 घंटे के लिए रख देते है। इसके बाद इस घोल को कपड़े से छानकर भंडारण कर लेते है । | एक बार बनाकर उसे छः माह तक उपयोग कर सकते है। ब्रह्मास्त्र का भंडारण मिट्टी के बर्तन में करें। गोमूत्र धातु के बर्तन में न रखे। एक एकड़ हेतु 100 लीटर पानी में 3 से 4 लीटर ब्रह्मास्त्र मिला कर छिड़काव करते है। |
अग्निस्त्र : | 20 लीटर गोमूत्र, 5 किलो नीम के पत्ते की चटनी, 500 ग्राम तम्बाकू पाउडर, 500 ग्राम हरी तीखी मिर्च, 500 ग्राम देशी लहसुन की चटनी। | सभी सामग्री को एक मिट्टी के बर्तन में डालें और आग पर रखकर तीन से चार बार उबाल ले । इस सामग्री को 8-10 घन्टे के अंतराल पर डंडे से चलाकर कपड़े से ढक दें। 48 घंटे में तैयार हो जाएगा | अग्निस्त्र का प्रयोग केवल तीन माह तक कर सकते हैं । मिट्टी के बर्तन पर ही सामग्री को उबल आने तक पकाए । 5 लीटर अग्नी अस्त्र को छानकर 200 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे मशीन से छिड़काव करें। |
दर्शपर्णी अर्क : | 200 लीटर पानी, 2 किलो प्रत्येक करंज, सीताफल, धतूरा, तुलसी, पपीता, बेल, कनेर के पत्ती, और 5 किलो नीम के पत्ते, 2 किलो गाय का गोबर, 500 ग्राम तीखी हरी मिर्च 200 ग्राम अदरक/सोंठ, 10 लीटर गोमूत्र, 500 ग्राम तम्बाकू पीस, 500 ग्राम लहसुन, 500 ग्राम पीसी हल्दी | प्लास्टिक के ड्रम में 200 लीटर पानी डाले। फिर सभी पत्तियों की चटनी डाले और डंडे से चलाएं। दूसरे दिन तम्बाकू, मिर्च, लहसुन, सोठ, हल्दी डाले फिर डंडे से चलाकर अच्छे से मिला ले एवं जालीदार कपड़े से बंद कर दें। 40 दिन छाए में रखा रहने दे, परंतु सुबह शाम डंडे की सहायता से इस घोल को चलाएं। | दशपर्णी को छः माह तक प्रयोग कर सकते हैं। इस दशपर्णी अर्क को छाये में रखें । इसको सुबह शाम चलाना न भूले। 200 लीटर पानी में 5 से 8 लीटा दशपर्णी अर्क मिलाकर छिड़काव करें। |
कक्षा : 9 परम्परागत भोजन को पोषक और रोचक कैसे बनाए
खाना बनाने की परम्परागत विधियाँ और उनके लाभ
आदिवासी समुदायों में पीढ़ियों से चली आ रही परम्परागत खाना बनाने की विधियाँ न केवल संस्कृति और पहचान का हिस्सा हैं, बल्कि स्वास्थ्य और पोषण के दृष्टिकोण से भी अत्यंत लाभकारी हैं। आधुनिक जीवनशैली और एल्यूमिनियम/तेज गैस आधारित खाना बनाने की प्रक्रियाओं ने पारंपरिक विधियों को पीछे छोड़ दिया है, जिससे पोषण में कमी और रोगों का खतरा बढ़ा है। ऐसे में परम्परागत खाना पकाने की विधियों को पुनर्जीवित करना आज की आवश्यकता है।
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मिट्टी के बर्तन में खाना बनाना
मिट्टी के बर्तन भोजन को धीमी आँच पर पकाते हैं, : विटामिन और मिनरल्स नष्ट नहीं होते।
मिट्टी के बर्तन में बना खाना क्षारीय होता है, जो शरीर के pH संतुलन को बनाए रखता है।
इनमें लोहा, कैल्शियम और जिंक जैसे सूक्ष्म पोषक तत्व भोजन में स्वतः मिल जाते हैं।
लोहे की कढ़ाई/तवा में खाना बनाना
लोहे के बर्तनों में पकाया गया भोजन शरीर को अतिरिक्त आयरन (लोहा) प्रदान करता है, जिससे एनीमिया की समस्या में राहत मिलती है।
हरी सब्जियों, पालक, मैथी, टमाटर, आदि लोहे की कढ़ाई में पकाने पर लाभकारी होती हैं।
लकड़ी या गोबर से धीमी आँच में पकाना
धीमी आँच में भोजन पकाने से पोषक तत्व नष्ट नहीं होते।
पकाने में धुएं और मिट्टी की खुशबू स्वाद को बढ़ाती है और पारंपरिक पहचान बनाए रखती है।
सिलबट्टे पर पीसना
मिक्सर की अपेक्षा सिलबट्टे पर पीसे गए मसाले अधिक सुगंधित व स्वास्थ्यवर्धक होते हैं।
इससे हाथों की कसरत होती है और मसालों में मौजूद प्राकृतिक तेल नष्ट नहीं होते।
पत्तों में खाना पकाना या परोसना
साग, सिमर, के पत्ते पत्तों से मिलने वाले सूक्ष्म पोषक तत्व भोजन में मिलते हैं।
यह प्लास्टिक या एल्युमिनियम फॉयल के पर्यावरणीय दुष्प्रभाव से बचाव करता है।
पानीया खाखरे, आक, के पत्ते में मक्की का पानिये।
कक्षा : 11 पक्षीयों के माध्यम से फसलों में कीट नियंत्रण
तालिका : 20 पक्षीयों से कीट नियंत्रण
प्रक्रिया | किसी एक किसान के घर पर चर्चा |
समयावधि | 2 से 3 घण्टे |
मुख्य संदेश | फसल कटाई के बाद, यदि मुर्गियों को खेत में जाली या पिंजरे से ढककर छोड़ दिया जाए, तो वे उस स्थान के कीट और खरपतवारों को खत्म कर देती हैं। इसके साथ ही, यह प्रक्रिया भूमि की उर्वरक शक्ति को भी बढ़ाती है। इसके अलावा, अपने चावल के खेत के पास एक छोटा तालाब बनाकर मछली पालन करना भी फायदेमंद हो सकता है। |
चर्चा के बिन्दु | पक्षियों और जानवरों का उपयोग : |
![]() मुर्गियों द्वारा किट नियंत्रण | ![]() बिजली के माध्यम से किट नियंत्रण |























