परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन बनाती महिलाएं

परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन बनाती महिलाएं

Published on August 7, 2026

Summary

यह चर्चा महिलाओं द्वारा परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन बनाने के महत्व पर प्रकाश डालती है। इसमें शिक्षा, परिवार, प्रौद्योगिकी और समाज की भूमिका पर भी विस्तार से बात की गई है।

मेजबान: नमस्कार।

स्वाति जी: नमस्कार।

मेजबान: स्वाति जी आपका बहुत-बहुत स्वागत करते हैं हम हमारे आज के कार्यक्रम घूमर में।

स्वाति जी: धन्यवाद।

मेजबान: जैसा कि आज आप हमारे कार्यक्रम से जुड़ रहे हैं और आज हमारी कार्यक्रम में आपसे बातचीत का विषय है परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन बनाती महिलाएं। हम देखते हैं कि महिलाएं जो हैं वो दोनों के बीच संतुलन बनाने का कार्य कर रही है। तो कैसे इस संतुलन का बनाकर रख रही है, वह मैं आपसे जानना चाहूंगी।

स्वाति जी: जी, जब हम महिलाओं की बात करते हैं तो सिर्फ आधुनिकता और परंपरा में नहीं, महिला हर जगह अपनी एक अलग भूमिका निभाती है। तो इसमें भी महिलाओं का एक अलग ही भूमिका है। जब हम देखते हैं कि आज की महिलाएं अपनी संस्कृति और परंपराओं को समान अवसर दे रही है जैसे शिक्षा हो गया, तकनीक और नए अवसरों को भी अपना रही है। उसको कैसे आगे लेकर जाना है उसके बारे में सोच रही है। साथ-साथ में घर की जिम्मेदारियों को भी निभा रही है और अपने सपनों को भी पूरा करने की कोशिश कर रही है। तो कहीं ना कहीं यह सब जब हम देखते हैं तो परंपरा और आधुनिकता के बीच में महिलाएं काफी एक अच्छा पुल जैसा काम कर रही है जहां पर दोनों को जोड़कर रखने की एक अलग भूमिका महिलाएं इस समय में निभा रही है।

मेजबान: बिल्कुल आपने सही कहा तो यही मैं जानना चाहूंगी कि क्या परंपरा और आधुनिकता के बीच टकराव होता है?

स्वाति जी: बिल्कुल हम लोग कभी-कभी जब देखते हैं तो लगता है कि दोनों के बीच में टकराव है, आधुनिकता होनी भी चाहिए और नहीं भी होनी चाहिए। लेकिन सही समझ और सोच के साथ में अगर चलाया जाए तो दोनों के बीच में टकराव का कोई ऑप्शन नहीं दिखता। हम लोग जब देखते हैं कि परंपराएं जब हमारी जड़ों से जुड़ी हुई होती है और आधुनिकता हमें आगे बढ़ाने के लिए रास्ता दिखाती है। तो कहीं ना कहीं हमें कोशिश करनी चाहिए कि परंपरा और आधुनिकता को हम लोग साथ में लेकर जाएं। जब हम आधुनिक हो जाते हैं या फिर आधुनिक बनने की कोशिश करते हैं तो हमारी परंपराएं हमसे छूटे ना।

मेजबान: बिल्कुल।

स्वाति जी: तो यह हमें पूरी कोशिश करनी चाहिए।

मेजबान: बिल्कुल आपने सही कहा। तो इन सारी चीजों को लेकर गांव और शहरों की महिलाओं के अनुभव में क्या फर्क आपको दिखाई देता है?

स्वाति जी: बिल्कुल। जब हम शहरों की महिलाओं की बात करते हैं तो उनके सामने बहुत अवसर होते हैं या फिर वह महिलाएं काफी जागरूक होती हैं, हम ऐसा भी कह सकते हैं। तो कोशिश यह करनी चाहिए कि हर महिलाओं को हम लोग अवसर दें। तो चाहे गांव की महिलाएं हो चाहे शहर की महिलाएं हो, आजकल हम देखें तो शहर में जैसे शिक्षा हो गया, रोजगार के बहुत सारे अवसर प्रदान हो जाते हैं। वहीं गांव में भी अभी बदलाव आ रहा है। जैसे स्वयं सहायता समूह हो गया या फिर छोटे-छोटे व्यवसाय हो गए जो महिला खुद चलाती है। शिक्षा हो गई और उसके साथ-साथ में खेतीबाड़ी के साथ में महिला अपना एक अलग अनुभव लेकर जा रही है। तो हमें यह कोशिश करनी चाहिए कि महिलाओं को हम सबसे पहले अवसर दें। उनके अवसर को उनसे ना छीने। चाहे ग्रामीण महिला हो चाहे शहर की महिला हो, उन्हें अवसर हमें जरूर देना चाहिए।

मेजबान: बिल्कुल आपने सही कहा। जैसा कि आपने बताया कि महिलाओं को अवसर देने की जरूरत है ताकि महिलाएं जो हैं वह अपने पैरों पर खड़ी हो सके, अपने आप में आत्मनिर्भर बन सके। यहीं मैं यह जानना चाहूंगी कि परंपरा और आधुनिकता का जो संतुलन बनाकर रखना है हमें, उसमें परिवार और समाज की क्या भूमिका है?

स्वाति जी: बिल्कुल। जब हम महिलाओं की बात करते हैं तो कहीं ना कहीं परिवार एक अलग भूमिका में नजर आता है और उसके साथ-साथ में समाज की भी एक अपनी भूमिका है। तो हमें यह देखना पड़ेगा कि परिवार और समाज जो महिलाएं हैं उनका पूरा सहयोग करें क्योंकि जब तक परिवार और समाज सहयोग नहीं करेगा, महिलाएं शायद सोच भी नहीं सकती कि इस बारे में उन्हें आगे बढ़ना है। तो हमें सबसे पहले कोशिश यह करनी चाहिए कि महिलाओं को पढ़ने का अवसर दें, उनको काम करने और चाहे खेतीबाड़ी हो, चाहे व्यवसाय हो, उन्हें निर्णय लेने का मौका दें। उन्हें प्रोत्साहित करें ताकि महिलाएं खुद परिवार से आत्मविश्वास होकर बनेगी तब जाकर समाज में आत्मविश्वासी बन पाएगी और साथ-साथ में ही अपने देश में भी कुछ ना कुछ काम करके अपने देश को भी आगे बढ़ा सकती है।

मेजबान: बिल्कुल आपने सही कहा तो क्या शिक्षा इस संतुलन को बनाए रखने में मदद करती है?

स्वाति जी: बिल्कुल। जब हम शिक्षा की बात करते हैं तो एक महिला के लिए बहुत जरूरी है कि वह शिक्षित हो क्योंकि शिक्षा एक अलग भूमिका में नजर आती है। शिक्षा से महिलाओं में समझ, आत्मविश्वास और सही निर्णय लेने की क्षमता तो बढ़ती ही है, साथ में सही और गलत क्या है उसका निर्णय लेने में भी महिलाओं की मदद करती है।

मेजबान: बिल्कुल आपने सही कहा क्योंकि हम देखते हैं कि शिक्षा एक वह पुल की तरह होती है जो महिलाओं को बहुत सारी चीजों की सीख देती है। वह महिलाओं को जागरूक भी करती है, साथ ही महिलाएं जो हैं वह सही गलत की चीजों को समझ पाती हैं। अक्सर हम देखते हैं कि बहुत सी बार महिलाएं कम पढ़ी-लिखी होने की वजह से बहुत सारी चीजों से ठगी जाती हैं। ऐसे में एक शिक्षित महिला अगर होगी तो वह बहुत सारी चीजों के बीच में संतुलन बनाने का कार्य करती हैं। यही अब मैं जानना चाहूंगी कि आज की महिलाएं तकनीक और सोशल मीडिया का कैसे उपयोग कर रही हैं?

स्वाति जी: बिल्कुल। आज हम लोग जब सोशल मीडिया और तकनीक की बात करते हैं तो हर तरह की जानकारी हमें आजकल सोशल मीडिया से उपलब्ध हो जाती है। चाहे शिक्षा हो, चाहे व्यवसाय हो, चाहे खाने बनाने का तरीका हो, चाहे फैशन हो। यह सारी जानकारी हमें सोशल मीडिया से या फिर इंटरनेट से आराम से मिल जाता है। तो आजकल की महिलाएं मोबाइल और इंटरनेट के माध्यम से नई-नई जानकारियां तो प्राप्त कर ही रही है, साथ में ही ऑनलाइन कैसे काम किया जाए या फिर खुद का छोटा-छोटा व्यवसाय कैसे शुरू किया जाए, महिलाएं यह भी सीख रही है। तो यह बहुत एक अच्छी पहल है महिलाओं के द्वारा या फिर हमारे जो अलग-अलग विभाग हैं, उन विभागों के द्वारा कि यह सारी जानकारी सोशल मीडिया और इंटरनेट के माध्यम से घर बैठे-बैठे उन महिलाओं तक पहुंच रही है जो महिलाएं शायद घर से बाहर निकलने का कभी सोचती भी ना हो। तो यह एक अच्छी पहल है जो महिलाओं को एक नई उड़ान देने की कोशिश कर रही है।

मेजबान: बिल्कुल आपने सही कहा जैसा कि आपने बताया कि यह महिलाओं को एक नई उड़ान देने की कोशिश कर रही है। लेकिन बहुत सी बार हमने बहुत से लोगों से यह शिकायत सुनी है कि महिलाएं तकनीक और सोशल मीडिया के चक्कर में बहुत सारी चीजों से पीछे छूटती जा रही हैं। घर के काम को लेकर ले लो या बच्चों की परवरिश को लेकर इन सारी चीजों को ले लो। तो ऐसे में आप उन महिलाओं को क्या सीख देना चाहेंगी कि वह इन तकनीकों का प्रयोग करते हुए भी अपने घर परिवार की जिम्मेदारियों को कैसे अच्छे से संभाले?

स्वाति जी: जी। जब हम कोई भी विषय देखते हैं तो हर विषय का सकारात्मक और नकारात्मक पहलू दोनों होते हैं। आजकल हम देखें महिलाएं काफी समय सोशल मीडिया पर, फेसबुक पर, इंस्टाग्राम पर बिता रही है तो कहीं ना कहीं उनका समय प्रबंधन बिगड़ रहा है। वह शायद परिवार को, अपने बच्चों को, अपने काम को सही समय नहीं दे पा रही हैं। तो मैं महिलाओं को यही कहना चाहूंगी कि काम और घर दोनों की जिम्मेदारी उनको अगर संभालनी है तो उनको समय प्रबंधन सीखना पड़ेगा, उनको समय प्रबंधन करना पड़ेगा, तभी कहीं ना कहीं यह चुनौती उनके सामने से दूर होगी। साथ में ही परिवार का भी इसमें एक बहुत अहम भूमिका है कि जैसे अगर महिला कामकाजी महिला है या फिर घरेलू महिला है उनको काम में मदद करें, उनके काम में हाथ बटाएं ताकि महिला अपने काम के साथ-साथ में खुद को भी समय दे सके और परिवार को भी समय दे सके।

मेजबान: बिल्कुल आपने सही कहा। यहीं अब मैं जानना चाहूंगी कि कामकाजी महिलाओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या होती है?

स्वाति जी: कामकाजी महिलाओं की बात हम जब करते हैं तो सबसे बड़ी चुनौती उनके सामने समय प्रबंधन ही होता है क्योंकि महिलाएं कहीं ना कहीं घर का काम भी कर रही है साथ में अपने कामकाज को भी संभाल रही है, अपने बच्चों को भी समय दे रही है, उनके शिक्षा को भी समय दे रही है। तो हमें यह कोशिश करनी चाहिए कि सबसे पहले महिलाओं का साथ दें, उनकी परेशानियों को समझें, उनसे बात करें क्योंकि कई बार ऐसा होता है कि महिलाएं अपनी बात परिवार के सामने, अपने जीवन साथी के साथ में नहीं बांट पाती।

मेजबान: बिल्कुल।

स्वाति जी: क्योंकि उन्हें मौका नहीं दिया जाता। तो हमें कोशिश यह करनी चाहिए कि हम सबसे पहले महिलाओं को मौका दें, उनकी बात को सुने, उनके निर्णय को अहम भूमिका दें ताकि महिलाएं अपनी बात को छुपा के ना रखें, अपने परिवार के साथ में बांट सके, कम से कम अपने जीवन साथी के साथ में बांट सके।

मेजबान: बिल्कुल आपने सही कहा तो जैसा कि आपके माध्यम से हम ढेर सारी बातों को जान रहे हैं और आज हम परंपरा और आधुनिकता के बीच महिलाएं संतुलन कैसे बनाती है इसको लेकर बात कर रहे हैं। तो क्या परंपराओं में भी समय के साथ बदलाव जरूरी है?

स्वाति जी: जब हम परंपराओं की बात करते हैं तो शायद जरूरी है क्योंकि कुछ परंपराएं ऐसी हैं जो रूढ़िवादी परंपराओं में बदल रही है तो उन परंपराओं में बदलाव लाने की या फिर उनमें अपडेशन लाने की जरूरत है। लेकिन परंपराओं की भी उतनी ही ताकत है या फिर उतनी ही जरूरत है जितनी आज हम तकनीक की बात करते हैं। तो दोनों में संतुलन रहना जरूरी है। बदलाव होना या नहीं होना वह अपने ऊपर निर्भर करता है कि हम किस तरीके से उस बदलाव को देख रहे हैं या हम क्यों बदलाव चाह रहे हैं। वह हमारी सोच के ऊपर या हमारी परेशानी के ऊपर देखा जा सकता है कि उन परंपराओं को हम क्यों बदलना चाह रहे हैं। तो सबसे पहले यह समझने की कोशिश कीजिए कि परंपराएं बुरी नहीं है क्योंकि बहुत सारी ऐसी परंपराएं हैं जो हमारे काफी लंबे समय से हमारे परिवार के साथ में या फिर हमारे घर वालों के साथ में चलती आई है। तो हम उन परंपराओं को समझे, उनको साथ दें क्योंकि आजकल की जो महिलाएं हैं वह आधुनिक काफी होने की वजह से इन परंपराओं से पीछे हटती जा रही है। तो हमें यह देखने की जरूरत है कि परंपराओं को बदले ना। अगर कुछ बदलाव है जो करने की जरूरत है वह हम कर सकते हैं लेकिन परंपराओं को और आधुनिकता दोनों को एक साथ लेकर अगर चलेंगे तो ज्यादा अच्छा रहेगा।

मेजबान: बिल्कुल आपने सही कहा। यहीं अब मैं जानना चाहूंगी कि आज की महिलाएं समाज के विकास में कैसे योगदान दे रही है?

स्वाति जी: देखिए, जब हम महिलाओं की बात करते हैं तो महिलाएं भी कहीं ना कहीं पुरुष के कंधे से कंधा मिलाकर हर क्षेत्र में काम कर रही है। तो आज की महिलाएं जैसे शिक्षा हो गया, स्वास्थ्य हो गया, खेती हो गया, व्यवसाय, नेतृत्व जैसी कई क्षेत्रों में आगे बढ़ रही है और काम भी कर रही है। इससे ना केवल उनका जीवन बेहतर हो रहा है, वह अपने परिवार के जीवन को साथ-साथ में पूरे समाज के जीवन को बेहतर कर रही है। और जब हम देश की भी बात करते हैं तो जितने भी मुख्य हमारे विभाग हैं या फिर जितने मुख्य हमारे औद्योगिक जगह है वहां पर महिलाओं ने एक अलग भूमिका ले रखी है। तो कहीं ना कहीं यह बहुत जरूरी है कि महिलाएं समाज के विकास के साथ-साथ में देश के विकास में भी योगदान दे रही है।

मेजबान: बिल्कुल आपने सही कहा तो जैसा कि आज हमारी कार्यक्रम में आपसे बहुत अच्छी बातें रही हैं कि परंपरा और आधुनिकता के बीच महिलाएं संतुलन कैसे बना सकती हैं और किस तरीके से परंपराओं को समय के साथ बदलना हमारे लिए जरूरी है। यहीं अंत में आप हमारे जो युवा पीढ़ी की लड़कियां हैं उन्हें कार्यक्रम के माध्यम से क्या संदेश देना चाहेंगे?

स्वाति जी: जी, मेरा जो युवा पीढ़ी है, जो हमारी महिलाएं हैं, उनको एक ही संदेश है कि हमारी जो परंपराएं हैं उनका सम्मान करें, आधुनिकता के साथ-साथ में परंपराओं को भी लेकर चलें क्योंकि एकदम आधुनिक होना भी परंपराओं को कहीं ना कहीं पीछे छोड़ देता है। तो हमें यह कोशिश करनी पड़ेगी कि कहीं ना कहीं हमारे सपनों को जो पहचान मिल रही है, वह कहीं ना कहीं परंपराओं से भी मिल रही है। तो शिक्षा और आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़े और समाज के विकास में अपनी जो भूमिका है उसको पूरी तरह निभाएं।

मेजबान: बिल्कुल। तो स्वाति जी आपका धन्यवाद करना चाहूंगी कि आप हमारे कार्यक्रम से जुड़ी और आपका कीमती समय आपने हमें दिया।

स्वाति जी: धन्यवाद।

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