लेवरा (Levraa) पद्धतिः छत्तीसगढ़ के पहाड़ी क्षेत्रों की पारम्परिक बिना जुताई खेती प्रणाली

लेवरा (Levraa) पद्धतिः छत्तीसगढ़ के पहाड़ी क्षेत्रों की पारम्परिक बिना जुताई खेती प्रणाली

Published on August 7, 2026

Summary

यह लेख छत्तीसगढ़ की 'लेवरा' पद्धति का वर्णन करता है, जो एक पारंपरिक, बिना जुताई वाली खेती प्रणाली है। यह आदिवासी समुदायों, विशेषकर पहाड़ी कोरवा जनजाति द्वारा अपनाई जाती है, जो खाद्य सुरक्षा और पर्यावरणीय स्थिरता सुनिश्चित करती है।

लेवरा (Levraa) पद्धतिः छत्तीसगढ़ के पहाड़ी क्षेत्रों की पारम्परिक बिना जुताई खेती प्रणाली

लेखक: संजय शर्मा

प्रस्तावना

भारत की पारम्परिक कृषि प्रणालियाँ स्थानीय परिस्थितियों, प्राकृतिक संसाधनों तथा समुदायों के अनुभवों पर आधारित रही हैं। छत्तीसगढ़ के आदिवासी अंचलों में ऐसी अनेक कृषि पद्धतियाँ आज भी प्रचलित हैं, जो कम संसाधनों में भी आजीविका का आधार बनी हुई हैं। इन्हीं में से एक महत्वपूर्ण पारम्परिक कृषि पद्धति है "लेवरा" (Levraa), जिसे बिना जुताई (No-Tillage) खेती प्रणाली के रूप में जाना जाता है।

लेवरा पद्धति विशेष रूप से उन किसानों द्वारा अपनाई जाती रही है जिनकी आर्थिक स्थिति कमजोर होती है तथा जिनके पास हल, बैल अथवा खेत की जुताई कराने के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध नहीं होते। यह पद्धति प्राकृतिक वर्षा पर आधारित एक सरल, कम लागत एवं पारम्परिक कृषि तकनीक है, जिसने दशकों से गरीब एवं आदिवासी परिवारों की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

लेवरा पद्धति क्या है?

लेवरा पद्धति में खेत की जुताई किए बिना बीजों को सीधे खेत में छिड़क दिया जाता है। वर्षा प्रारम्भ होने के साथ ही मिट्टी में पर्याप्त नमी आने पर बीज अंकुरित हो जाते हैं और फसल तैयार हो जाती है। इस प्रक्रिया में न तो हल चलाने की आवश्यकता होती है और न ही अतिरिक्त कृषि यंत्रों का उपयोग करना पड़ता है।

सरगुजा संभाग के पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासी समुदायों, विशेषकर पहाड़ी कोरवा जनजाति द्वारा इस पद्धति का लंबे समय से उपयोग किया जाता रहा है।

पारम्परिक ज्ञान एवं स्थानीय अनुभव

सरगुजा जिले के अंबिकापुर विकासखंड अंतर्गत ग्राम पंचायत पम्पापुर के आश्रित ग्राम गाजरभावना के पहाड़ी कोरवा किसान बुद्धराम बताते हैं कि पहले अधिकांश गरीब परिवार लेवरा पद्धति से खेती करते थे। जिन परिवारों के पास हल-बैल नहीं होते थे, अथवा जो खेत की जुताई का खर्च वहन नहीं कर पाते थे, उनके लिए यही खेती का सबसे उपयुक्त विकल्प था।

कई बार ऐसा भी होता था कि किसानों के कुछ खेत समयाभाव के कारण जुताई से वंचित रह जाते थे। ऐसे खेतों में भी किसान सीधे बीज छिड़क देते थे और अच्छी वर्षा होने पर संतोषजनक उत्पादन प्राप्त कर लेते थे।

आज आधुनिक कृषि तकनीकों के विस्तार के कारण इस पद्धति का उपयोग पहले की तुलना में कम हो गया है, फिर भी सरगुजा संभाग के अनेक पहाड़ी गांवों में कुछ परिवार आज भी इस परम्परागत प्रणाली को अपनाए हुए हैं।

लेवरा पद्धति में बोई जाने वाली प्रमुख फसलें

इस पद्धति के अंतर्गत मुख्य रूप से स्थानीय एवं पारम्परिक फसलों की खेती की जाती है, जिनमें प्रमुख हैं –

  • स्थानीय एवं पारम्परिक धान की किस्में
  • रागी (मड्डुवा)
  • चना
  • मटर
  • उड़द
  • मूंग
  • तिल

इन फसलों का चयन स्थानीय जलवायु, वर्षा तथा कम कृषि निवेश की आवश्यकता को ध्यान में रखकर किया जाता है।

आजीविका एवं खाद्य सुरक्षा में योगदान

लेवरा पद्धति आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध होती रही है। इस पद्धति में खेती की लागत बहुत कम आती है क्योंकि जुताई, पशुशक्ति तथा कृषि यंत्रों पर खर्च नहीं करना पड़ता।

इस प्रणाली के माध्यम से गरीब परिवार वर्ष भर के लिए अपनी मूलभूत खाद्य आवश्यकताओं-जैसे चावल, दाल एवं तिलहन से तेल की व्यवस्था कर लेते थे। इस प्रकार यह पद्धति केवल कृषि तकनीक नहीं बल्कि ग्रामीण खाद्य सुरक्षा एवं आत्मनिर्भरता का आधार भी रही है।

पर्यावरणीय महत्व

लेवरा पद्धति प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है।

इस पद्धति के प्रमुख पर्यावरणीय लाभ निम्नलिखित हैं—

  • भूमि की जुताई न होने से मिट्टी का कटाव कम होता है।
  • मिट्टी की प्राकृतिक संरचना एवं जैविक गतिविधियाँ सुरक्षित रहती हैं।
  • कृषि में ऊर्जा एवं श्रम की आवश्यकता कम होती है।
  • वर्षा आधारित खेती को बढ़ावा मिलता है।
  • कम लागत एवं कम कार्बन उत्सर्जन वाली कृषि प्रणाली विकसित होती है।
  • स्थानीय बीजों एवं पारम्परिक कृषि ज्ञान का संरक्षण होता है।

आज जब जलवायु परिवर्तन एवं टिकाऊ कृषि (Sustainable Agriculture) पर विश्वभर में चर्चा हो रही है, तब लेवरा जैसी पारम्परिक प्रणालियाँ जलवायु-अनुकूल कृषि (Climate Resilient Agriculture) का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करती हैं।

निष्कर्ष

लेवरा पद्धति छत्तीसगढ़ के आदिवासी समाज के पारम्परिक कृषि ज्ञान, प्रकृति के साथ सामंजस्य तथा संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग का जीवंत उदाहरण है। यह केवल एक खेती की तकनीक नहीं, बल्कि सीमित संसाधनों में सम्मानपूर्वक जीवनयापन की सामुदायिक बुद्धिमत्ता का प्रतीक है।

आज आवश्यकता है कि ऐसी पारम्परिक कृषि प्रणालियों का वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण किया जाए, स्थानीय किसानों के अनुभवों को संरक्षित किया जाए तथा आधुनिक कृषि अनुसंधान के साथ इनका समन्वय स्थापित किया जाए। इससे न केवल आदिवासी समुदायों के पारम्परिक ज्ञान का संरक्षण होगा, बल्कि टिकाऊ, कम लागत एवं जलवायु-अनुकूल कृषि को भी बढ़ावा मिलेगा।

संदर्भ व्यक्तिः श्री बुद्धराम, पहाड़ी कोरवा किसान ग्राम गाजरभावना, ग्राम पंचायत पम्पापुर विकासखंड अंबिकापुर, जिला सरगुजा (छत्तीसगढ़)

लेखक: संजय शर्मा

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