पहाड़ी कोरवा समुदाय का सामाजिक-सांस्कृतिक एवं आजीविका आधारित अध्ययन
Published on August 7, 2026
Summary
यह रिपोर्ट छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के गाजरभावना गाँव में पहाड़ी कोरवा समुदाय के सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन और आजीविका का अध्ययन करती है। यह उनकी वन-निर्भरता, परंपराओं, धार्मिक विश्वासों और शिक्षा, स्वास्थ्य तथा विकास संबंधी चुनौतियों पर प्रकाश डालती है।
विषय : पहाड़ी कोरवा समुदाय का सामाजिक-सांस्कृतिक एवं आजीविका आधारित अध्ययन
(ग्राम गाजरभावना, ग्राम पंचायत पम्पापुर, विकासखंड अंबिकापुर, जिला सरगुजा, छत्तीसगढ़)
1. प्रस्तावना
पहाड़ी कोरवा छत्तीसगढ़ राज्य की एक विशेष संरक्षित जनजाति (PVTG) है। यह समुदाय मुख्यतः सरगुजा, बलरामपुर, जशपुर एवं कोरबा जिलों के पहाड़ी क्षेत्रों, घाटियों और जंगलों में निवास करता है। पहाड़ी कोरवा समुदाय की कुल जनसंख्या 44,026 है, जिसमें पुरुष जनसंख्या 22,196 एवं महिला जनसंख्या 21,830 है। इस समुदाय का स्त्री-पुरुष लिंगानुपात 984 है।
समय के साथ इस समुदाय की जनसंख्या में लगातार कमी देखी जा रही है। इसी कारण केंद्र सरकार द्वारा इन्हें विशेष संरक्षित जनजाति की श्रेणी में रखा गया है। राज्य सरकार ने पहाड़ी कोरवा विकास प्राधिकरण का गठन कर इनके लिए विशेष योजनाएं संचालित की हैं, किंतु इसके बावजूद यह समुदाय आज भी शिक्षा, स्वास्थ्य, आजीविका, आवास एवं सामाजिक विकास की दृष्टि से मुख्यधारा से बहुत दूर है।
यह रिपोर्ट सरगुजा जिले के अंबिकापुर विकासखंड अंतर्गत ग्राम पंचायत पम्पापुर के आश्रित ग्राम गाजरभावना में निवासरत पहाड़ी कोरवा परिवारों के जीवन, संस्कृति, धार्मिक विश्वास, सामाजिक व्यवस्था और आजीविका पर आधारित है।
2. अध्ययन क्षेत्र का परिचय
ग्राम : गाजरभावना ग्राम पंचायत : पम्पापुर विकासखंड : अंबिकापुर जिला : सरगुजा (छत्तीसगढ़) समुदाय : पहाड़ी कोरवा परिवार संख्या : लगभग 55 परिवार
गाजरभावना एक पहाड़ी कोरवा बाहुल्य ग्राम है, जहाँ समुदाय के लोग पारंपरिक रूप से जंगल आधारित जीवन जीते हैं। यह क्षेत्र वन संसाधनों से समृद्ध है और समुदाय का जीवन मुख्यतः प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित है।
3. अध्ययन का उद्देश्य
इस अध्ययन का उद्देश्य निम्न बिंदुओं पर जानकारी संकलित कर रिपोर्ट तैयार करना है—
- पहाड़ी कोरवा समुदाय की पारंपरिक जीवन शैली एवं संस्कृति का अध्ययन।
- धार्मिक विश्वासों एवं सामाजिक रीति-रिवाजों का दस्तावेजीकरण।
- आजीविका के साधनों एवं वन आधारित निर्भरता का आकलन।
- शिक्षा एवं स्वास्थ्य की वर्तमान स्थिति को समझना।
- सामाजिक व्यवस्था, विवाह एवं विवाद समाधान प्रणाली का अध्ययन।
4. अध्ययन पद्धति
यह अध्ययन ग्राम स्तर पर समुदाय के प्रमुख व्यक्तियों के साथ चर्चा कर किया गया। बुद्धराम, मुनेश्वर, धनकुंवर, नानसाय कोरवा एवं छोटे बुधराम के साथ संवाद कर पारंपरिक रहन-सहन, धर्म, रीति-रिवाज, भाषा, सामाजिक व्यवस्था एवं आजीविका के संबंध में जानकारी प्राप्त की गई।
5. सामाजिक एवं पारिवारिक परंपराएँ
5.1 प्रसव एवं जन्म परंपरा
पहाड़ी कोरवा समुदाय में बच्चा जन्म होने के बाद महिला को छठी तक मुख्य द्वार से बाहर निकलने की अनुमति नहीं होती। महिला के आने-जाने के लिए घर के पीछे अलग दरवाजा बनाया जाता है। छठी के बाद महिला सामान्य रूप से पूर्ववत जीवन जीने लगती है। हालांकि, कुछ पहाड़ी कोरवा परिवार जिन्होंने ईसाई धर्म अपना लिया है, वे इस परंपरा को नहीं मानते।
5.2 भगत प्रथा एवं सामाजिक व्यवहार
गहिरा गुरु द्वारा अभियान चलाकर कुछ पहाड़ी कोरवा लोगों को भगत बनाया गया। भगत बनने के बाद लोग मांस एवं मदिरा का सेवन छोड़ देते हैं।
भगत बने व्यक्ति अन्य समुदायों के यहाँ भोजन नहीं करते तथा अपने समुदाय के उन लोगों के यहाँ भी भोजन नहीं करते जो भगत नहीं बने हों। इससे समुदाय में सामाजिक विभाजन की स्थिति उत्पन्न हुई है।
6. पारंपरिक आजीविका एवं कृषि व्यवस्था
6.1 वन आधारित जीवन शैली
पहाड़ी कोरवा समुदाय परंपरागत रूप से जंगलों में निवास करता था। वे शिकार कर मांस खाते थे तथा जंगल से कंदमूल, फल एवं अन्य वन उत्पादों का सेवन करते थे।
6.2 झूम खेती (स्थानांतरित कृषि)
बाद में समुदाय ने खेती करना प्रारंभ किया। वे जंगल साफ कर मक्का, ज्वार-बाजरा, कोदो, कुटकी, मेझरी, सांवा आदि की खेती करते थे। कुछ वर्षों बाद वे स्थान बदल देते थे और नए स्थान पर फिर जंगल साफ कर खेती करते थे। खेत की जुताई किए बिना बीज छींटकर खेती की जाती थी। इस प्रणाली को झूम खेती कहा जाता है।
6.3 वर्तमान खेती
गाजरभावना के पहाड़ी कोरवा समुदाय द्वारा वर्तमान में रहर, धान, बेड़े, खेढ़ी, कोदो, कुटकी, बाजरा, लकड़ा आदि की खेती की जाती है। हालांकि पारंपरिक झूम खेती का प्रभाव आज भी देखा जा सकता है।
7. आवास एवं घरेलू जीवन
7.1 पारंपरिक आवास
पहाड़ी कोरवा समुदाय जंगलों में लकड़ी से दीवार बनाकर तथा घास-फूस और खजूर के पत्तों से छत बनाकर घर बनाते थे।
दरवाजा बांस या लकड़ी के जालीनुमा होते थे। घर में ताला लगाने की परंपरा नहीं थी, केवल जानवरों से सुरक्षा हेतु साधारण व्यवस्था की जाती थी।
7.2 बर्तन एवं उपयोग सामग्री
पहले मिट्टी के बर्तनों का उपयोग होता था। वर्तमान में एल्युमिनियम, लोहे एवं स्टील के बर्तन उपयोग में आ गए हैं।
8. धार्मिक विश्वास एवं पूजा प्रणाली
8.1 प्रमुख देवी-देवता
पहाड़ी कोरवा समुदाय देवी काली, गंगा बहिनी, महादेव, शिव-पार्वती को मानता है। ग्राम देवता को अपनी भाषा में “दिहाडीन महादेव" कहा जाता है।
8.2 प्रकृति पूजा
यह समुदाय पेड़-पौधे, नदी, पहाड़, जंगल को देवता के रूप में मानकर पूजा करता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि इनके जीवन में प्रकृति का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है।
8.3 बलि प्रथा में परिवर्तन
पूर्व में देवी-देवताओं की पूजा में शराब और मुर्गे की बलि दी जाती थी, लेकिन वर्तमान में यह परंपरा काफी कम हो गई है। जो लोग भगत बन चुके हैं, वे नारियल, अगरबत्ती आदि चढ़ाकर पूजा करते हैं।
8.4 सामाजिक धार्मिक नियम
- शादी के बाद लड़की मायके के पूजा घर में प्रवेश नहीं कर सकती।
- शिव-पार्वती की पूजा का स्थान घर के बाहर आंगन में होता है।
- पूजा स्थान पर बिना स्नान किए जाना वर्जित है।
- अन्य देवी-देवताओं को घर के अंदर भी रखा जाता है।
9. भाषा एवं सांस्कृतिक पहचान
पहाड़ी कोरवा समुदाय की भाषा “पारसी” बताई गई है, जिसका उपयोग समुदाय के लोग आपसी संवाद में करते हैं। यह भाषा उनकी सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
10. विवाह व्यवस्था एवं परंपराएँ
पहाड़ी कोरवा समुदाय में विवाह की प्रक्रिया इस प्रकार होती है—
- लड़के वाले लड़की मांगने लड़की के घर जाते हैं।
- मांगने के समय पारंपरिक शैली में संवाद किया जाता है।
- विवाह में लड़की की उम्र एवं शिक्षा को प्राथमिकता नहीं दी जाती।
- विवाह का पूरा खर्च लड़के पक्ष द्वारा वहन किया जाता है।
- विवाह के बाद लड़के को अलग कर दिया जाता है और परिवार चलाने की जिम्मेदारी दी जाती है।
यह परंपरा दर्शाती है कि समुदाय में विवाह के बाद शीघ्र आत्मनिर्भरता की अपेक्षा की जाती है।
11. समुदाय का प्रवास इतिहास
गाजरभावना के पहाड़ी कोरवा समुदाय के लोग डाडकेसरा (मैनपाट) से आए हैं। हालांकि वे स्वयं यह मानते हैं कि उनका मूल स्थान कोरबा जिला है, जहाँ से उनकी उत्पत्ति मानी जाती है।
12. सामाजिक व्यवस्था एवं विवाद समाधान प्रणाली
12.1 दरबार व्यवस्था
समाज में नियम उल्लंघन या विवाद की स्थिति में “दरबार” आयोजित किया जाता है। दरबार में सामाजिक नियमों के आधार पर विवाद का समाधान किया जाता है। दंड स्वरूप मुर्गा एवं दारू खिलाने की परंपरा है। इसके बाद व्यक्ति को पुनः समाज में शामिल कर लिया जाता है। छोटे विवाद एवं झगड़ों का समाधान भी इसी प्रणाली के माध्यम से किया जाता है।
13. वन आधारित आजीविका के स्रोत
गाजरभावना के पहाड़ी कोरवा समुदाय के लिए वन संसाधन आजीविका का प्रमुख आधार हैं। प्रमुख वन उत्पाद निम्न हैं –
- चार
- चिरौंजी
- तेंदू फल एवं तेंदू पत्ता
- महुआ
- डोरी
- साल बीज
- हर्रा, बहेरा, आँवला
- गोंद
- कोइनार, चकौड़ा जैसे पत्तों का साग
- जंगली कंदमूल एवं फल
इनमें से कुछ उत्पाद बाजार में बेचकर आय प्राप्त करते हैं तथा कुछ का उपयोग सीधे भोजन में करते हैं।
14. वस्त्र, त्योहार एवं सांस्कृतिक जीवन
समुदाय के लोग सामान्य दिनों में साधारण वस्त्र पहनते हैं, लेकिन त्योहार, विवाह एवं विशेष अवसरों पर पारंपरिक परिधान पहनते हैं।
देवी-देवताओं की पूजा में शराब का विशेष महत्व माना जाता है।
15. जल स्रोत एवं पर्यावरणीय दृष्टिकोण
पूर्व में यह समुदाय पीने के पानी हेतु प्राकृतिक जल स्रोतों पर निर्भर था। समुदाय का विश्वास है कि प्रकृति को नुकसान नहीं पहुँचाना चाहिए, बल्कि उसका संरक्षण करना आवश्यक है।
पेड़-पौधों, पहाड़ों, नदी-नालों की पूजा इस बात का प्रतीक है कि वे प्रकृति को भगवान का रूप मानते हैं।
16. स्वास्थ्य एवं पारंपरिक चिकित्सा
16.1 पारंपरिक उपचार प्रणाली
जंगलों में रहने के कारण पहाड़ी कोरवा समुदाय को औषधीय पौधों एवं जड़ी-बूटियों की अच्छी जानकारी है।
बीमार पड़ने पर वे स्वयं उपचार करते थे। पहले अस्पताल जाने की परंपरा नहीं थी।
16.2 वर्तमान स्थिति
अब लोग अस्पताल जाना शुरू कर चुके हैं, लेकिन केवल गंभीर बीमारी की स्थिति में।
16.3 स्नान परंपरा
परंपरागत रूप से स्नान हेतु चिकनी काली मिट्टी का उपयोग किया जाता था। कुछ स्थानों पर आज भी इसका उपयोग किया जाता है। समुदाय मानता है कि यह मिट्टी स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है।
17. शिक्षा की स्थिति
पहले पहाड़ी कोरवा समुदाय में बच्चों को पढ़ाने की परंपरा नहीं थी। अब शासन द्वारा पहाड़ी कोरवा आश्रम एवं छात्रावास स्थापित किए गए हैं, जहाँ बच्चों को निशुल्क रहने एवं भोजन की सुविधा दी जाती है। ग्राम स्तर पर बच्चे प्राथमिक शिक्षा तक पढ़ लेते हैं, परंतु मिडिल स्कूल तक पढ़ाई बहुत कठिनाई से हो पाती है। हाई स्कूल तक पहुँचने वाले बच्चों की संख्या अत्यंत कम है।
18. प्रमुख निष्कर्ष (Findings)
- पहाड़ी कोरवा समुदाय का जीवन आज भी वन आधारित संसाधनों पर निर्भर है।
- पारंपरिक झूम खेती धीरे-धीरे समाप्त हो रही है, लेकिन इसका प्रभाव अब भी मौजूद है।
- धार्मिक जीवन में प्रकृति पूजा का विशेष स्थान है।
- भगत प्रथा ने समुदाय के भीतर भोजन एवं सामाजिक संबंधों में विभाजन पैदा किया है।
- स्वास्थ्य सेवाओं की पहुँच सीमित है और पारंपरिक चिकित्सा ज्ञान आज भी उपयोगी है।
- शिक्षा में जागरूकता बढ़ी है, लेकिन मिडिल और हाई स्कूल स्तर पर dropout बहुत अधिक है।
- दरबार व्यवस्था समुदाय की मजबूत पारंपरिक न्याय प्रणाली है।
- सरकारी योजनाओं के बावजूद सामाजिक एवं आर्थिक विकास अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुँच पाया है।
19. समस्याएँ एवं चुनौतियाँ
- शिक्षा में निरंतरता का अभाव एवं उच्च स्तर पर बच्चों का स्कूल छोड़ना।
- स्वास्थ्य सुविधाओं तक सीमित पहुँच।
- वन उत्पादों पर अत्यधिक निर्भरता एवं आय के सीमित साधन।
- बाजार से कमजोर जुड़ाव एवं संसाधनों की कमी।
- पारंपरिक संस्कृति में परिवर्तन एवं नई सामाजिक चुनौतियाँ।
- समुदाय की घटती जनसंख्या।
20. सुझाव एवं अनुशंसाएँ
- शिक्षा हेतु विशेष प्रयास कर मिडिल एवं हाई स्कूल स्तर पर बच्चों को जोड़ने के लिए जागरूकता अभियान चलाया जाए।
- स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने हेतु नियमित स्वास्थ्य शिविर एवं मातृ-शिशु स्वास्थ्य कार्यक्रम संचालित किए जाएँ।
- वन उत्पादों के संग्रहण, प्रसंस्करण एवं बाजार व्यवस्था हेतु सामुदायिक समूह बनाए जाएँ।
- युवाओं एवं महिलाओं के लिए कौशल विकास प्रशिक्षण एवं स्वरोजगार कार्यक्रम शुरू किए जाएँ।
- समुदाय की भाषा, परंपरा एवं संस्कृति का दस्तावेजीकरण एवं संरक्षण किया जाए।
- पहाड़ी कोरवा विकास प्राधिकरण की योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन एवं निगरानी सुनिश्चित की जाए।
- पेयजल एवं स्वच्छता हेतु स्थायी जल स्रोत एवं शौचालय सुविधा विकसित की जाए।
21. निष्कर्ष
गाजरभावना ग्राम के पहाड़ी कोरवा समुदाय का जीवन आज भी प्रकृति आधारित संस्कृति, वन संसाधनों एवं पारंपरिक ज्ञान पर आधारित है। यह समुदाय आज भी शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास एवं आजीविका के क्षेत्र में गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है।
सरकारी योजनाओं एवं पहाड़ी कोरवा विकास प्राधिकरण के प्रयासों के बावजूद विकास का लाभ समुदाय तक सीमित रूप में पहुँच पाया है। समुदाय के समग्र विकास हेतु संस्कृति-संवेदनशील योजना, सहभागिता आधारित विकास मॉडल तथा आजीविका एवं शिक्षा के स्थायी प्रयास अत्यंत आवश्यक हैं।
यह रिपोर्ट दर्शाती है कि पहाड़ी कोरवा समुदाय के जीवन और संस्कृति का संरक्षण करते हुए उन्हें आधुनिक विकास की मुख्यधारा से जोड़ना समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता है।
रिपोर्ट तैयारकर्ता : (स्थानीय चर्चा एवं संकलित जानकारी पर आधारित) स्थान : ग्राम गाजरभावना, सरगुजा दिनांक :