भुंजिया (भुजिया) समुदाय पर समग्र रिपोर्ट
Published on August 7, 2026
Summary
This report details the socio-cultural life, traditions, and challenges of the Bhunjia community, a Particularly Vulnerable Tribal Group (PVTG) in Chhattisgarh, highlighting their unique 'Lal Bangla' custom and transition from forest-based livelihoods to wage labor.
भुंजिया (भुजिया) समुदाय पर समग्र रिपोर्ट मैदानी अध्ययनः ग्राम बी. के. बहरा, विकासखंड बागबाहरा, जिला महासमुंद, छत्तीसगढ़
रिपोर्ट तैयारकर्ताः संजय शर्मा
1. परिचयः भुंजिया (भुजिया) समुदाय
भुजिया (भुजिया) समुदाय छत्तीसगढ़ राज्य सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (PVTG) में से एक है। PVTG समूहों की पहचान कुछ विशेष मानकों के आधार पर की जाती है, जैसे— कृषि से पहले की तकनीक पर निर्भर जीवनशैली, कम साक्षरता, आर्थिक पिछड़ापन तथा जनसंख्या का स्थिर या घटता स्तर। इन्हीं कारणों से यह समुदाय जनजातीय समाज के भीतर भी सबसे अधिक हाशिये पर रहने वाले समुदायों में शामिल है।
भुंजिया जनजाति मुख्य रूप से छत्तीसगढ़ के गरियाबंद, महासमुंद और धमतरी जिलों के वन एवं अर्ध-वन क्षेत्रों में निवास करती है। विशेष रूप से मैनपुर एवं बागबाहरा विकासखंड में इनकी संख्या अधिक पाई जाती है। जनगणना 2011 के अनुसार राज्य में भुंजिया समुदाय की कुल जनसंख्या लगभग 10,603 है। इस समुदाय का लिंगानुपात 1029 महिलाएं प्रति 1000 पुरुष है, जो एक संतुलित जनसांख्यिकीय संरचना को दर्शाता है।
ऐतिहासिक रूप से भुंजिया समुदाय घने जंगलों या जंगलों के किनारे बसे क्षेत्रों में निवास करता था। उनकी आजीविका मुख्य रूप से वन संसाधनों पर आधारित थी, जिसमें शिकार, कंद-मूल एकत्र करना, जंगली फल-फूल और लघु वनोपज का संग्रह शामिल था। समय के साथ सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन, विस्थापन, भूमि हड़पने/बिक्री और बाहरी दबावों के कारण कई परिवार जंगल छोड़कर राजस्व गांवों में आकर बस गए। परिणामस्वरूप उनकी आजीविका में बदलाव आया और वे धीरे-धीरे कृषि तथा मजदूरी आधारित जीवन की ओर बढ़े।
भुंजिया समुदाय के पास परंपरागत एवं स्वदेशी ज्ञान का एक समृद्ध भंडार है। उनकी जीवनशैली प्रकृति के साथ गहरे जुड़ाव पर आधारित है। उनके पारंपरिक अभ्यासों में वन संसाधनों का सतत उपयोग, जंगली खाद्य पदार्थों व औषधीय पौधों की जानकारी, पर्यावरण अनुकूल आवास निर्माण, और सामुदायिक सहयोग की मजबूत व्यवस्था शामिल है।
भुंजिया समुदाय की एक अत्यंत विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान है – “लाल बंगला”। यह घर के बाहर निर्मित एक अलग और पवित्र रसोईघर होता है। यह केवल खाना पकाने की जगह नहीं है, बल्कि यह धार्मिक और सामाजिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। यहां पारिवारिक देवी-देवताओं का वास माना जाता है और यह शुद्धता एवं सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है।
समुदाय में गोत्र आधारित सामाजिक संरचना प्रचलित है। विवाह, सामाजिक संबंध, पूजा-पाठ एवं रीति-रिवाज गोत्र के नियमों से नियंत्रित होते हैं। विवाह, यौवन संस्कार (इंटोला), खान-पान, पहनावा और मृत्यु संस्कार जैसे पारंपरिक नियम उनकी समृद्ध संस्कृति को दर्शाते हैं।
हालांकि सांस्कृतिक रूप से यह समुदाय समृद्ध है, लेकिन आज उन्हें कई समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है जैसे— परंपरागत आजीविका का क्षय, वनों की घटती उपलब्धता, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित पहुंच, तथा युवा पीढ़ी में पारंपरिक ज्ञान का धीरे-धीरे लोप होना।
इस संदर्भ में भुजिया समुदाय के स्वदेशी ज्ञान एवं सांस्कृतिक परंपराओं का दस्तावेजीकरण, संरक्षण एवं पुनर्जीवन अत्यंत आवश्यक है, साथ ही समुदाय आधारित और युवाओं के नेतृत्व में विकास प्रयासों के माध्यम से उनके सामाजिक-आर्थिक सशक्तिकरण की आवश्यकता है।
2. समुदाय से संवाद एवं ज्ञान साझा करना
ग्राम बी.के. बहरा में समुदाय की महिलाओं के साथ एक केंद्रित समूह चर्चा आयोजित की गई। इस चर्चा में समुदाय की वरिष्ठ सदस्य गंगा बाई, साथ ही खेलकुंवर एवं विराहिन उपस्थित रहीं।
महिलाओं ने समुदाय की परंपराओं, विश्वासों, सामाजिक नियमों और दैनिक जीवन के अनुभवों को साझा किया। गंगा बाई ने विशेष रूप से समुदाय के धार्मिक विश्वासों, गोत्र व्यवस्था और पारंपरिक नियमों की महत्ता पर प्रकाश डाला, जिससे समुदाय की सांस्कृतिक जड़ों को समझने में सहायता मिली।
3. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि एवं उत्पत्ति
भुजिया समुदाय स्वयं को एक प्राचीन और पवित्र जनजाति मानता है। उनकी उत्पत्ति से संबंधित मान्यताएं मुख्य रूप से लोककथाओं एवं मौखिक परंपराओं पर आधारित हैं। समुदाय के अनुसार “भुंजिया” शब्द स्थानीय शब्द "भुंजना” से निकला है, जिसका अर्थ होता है— आग में जलना या भून जाना। समुदाय का विश्वास है कि उनके पूर्वज अग्नि से उत्पन्न हुए थे, और आग उनके लिए शुद्धता एवं पवित्रता का प्रतीक है।
एक अन्य प्रचलित कथा के अनुसार उनकी उत्पत्ति का संबंध भगवान शिव और माता पार्वती से है। मान्यता है कि इस क्षेत्र में निवास के दौरान एक घटना में झोपड़ी के भीतर रखे प्रतीकात्मक पुतले जल गए, और उसी अग्नि से भुंजिया लोगों का जन्म हुआ। यद्यपि यह कथा पौराणिक है, लेकिन समुदाय की पहचान और आत्मसम्मान के लिए इसका सांस्कृतिक महत्व अत्यधिक है।
भौगोलिक रूप से यह जनजाति छत्तीसगढ़ के गरियाबंद, धमतरी और महासमुंद जिलों में अधिक पाई जाती है। जनगणना 2011 के अनुसार उनकी कुल जनसंख्या लगभग 10,603 है, जो इसे एक छोटा एवं संवेदनशील समुदाय बनाती है।
पारंपरिक रूप से यह समुदाय जंगलों में निवास करता था और उनकी आजीविका शिकार, कंद-मूल संग्रह और वनोपज पर निर्भर थी। समय के साथ वनों की कटाई, भूमि हड़पने की घटनाएं, आर्थिक दबाव और सुरक्षित भूमि अधिकारों के अभाव के कारण उन्हें जंगल छोड़कर राजस्व गांवों में बसना पड़ा। कई मामलों में उनकी पैतृक भूमि बहुत कम कीमत पर बिक गई, जिससे विस्थापन और असुरक्षा बढ़ी।
फिर भी आज भी भुंजिया समुदाय अपनी कई पारंपरिक मान्यताओं और सांस्कृतिक संस्थाओं को जीवित रखे हुए है, जो प्रकृति से उनके ऐतिहासिक संबंध को दर्शाता है।
4. बसावट एवं आवास व्यवस्था
भुंजिया समुदाय पारंपरिक रूप से जंगलों के भीतर या जंगलों के किनारे छोटे-छोटे समूहों में रहता था। उनकी बसावट में आपसी सहयोग और सामूहिकता स्पष्ट दिखाई देती है।
4.1 पारंपरिक आवास
पहले भुंजिया परिवार कच्चे मकान बनाते थे, जिनमें स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग होता था जैसे—
- लकड़ी (विशेषकर महुआ)
- बांस
- घास एवं फूस
- मिट्टी में धान की पुआल मिलाकर
ये मकान पर्यावरण अनुकूल और मौसम के अनुसार अनुकूलित होते थे। घर निर्माण के दौरान समुदाय प्रकृति से अनुमति लेने जैसे सांस्कृतिक अनुष्ठान भी करता था, जो उनके पर्यावरणीय संवेदनशीलता को दर्शाता है।
4.2 पक्के मकानों की ओर बदलाव
वर्तमान समय में सरकारी आवास योजनाओं के कारण कई परिवार पक्के मकानों में रहने लगे हैं। इससे जीवन स्तर में सुधार हुआ है, परंतु समुदाय अब भी अपनी सांस्कृतिक परंपराओं को बनाए हुए है।
4.3 लाल बंगलाः एक विशिष्ट सांस्कृतिक संरचना
भुंजिया आवास व्यवस्था की सबसे खास पहचान “लाल बंगला” है। यह घर के बाहर बना एक अलग रसोईघर होता है, जिसे पवित्र स्थान माना जाता है।
लाल बंगला की मुख्य विशेषताएं:
- यह मुख्य घर से अलग होता है
- यहां पारिवारिक देवी-देवताओं और पूर्वजों का वास माना जाता है
- केवल एक ही गोत्र के परिवारजन ही अंदर जा सकते हैं
- विवाह के बाद बेटी को भी प्रवेश की अनुमति नहीं होती
- किसी बाहरी व्यक्ति या अन्य गोत्र के व्यक्ति के प्रवेश से यह अपवित्र माना जाता है
- ऐसी स्थिति में लाल बंगला को तोड़कर या जलाकर पुनः निर्माण किया जाता है
- नियम तोड़ने वाले व्यक्ति को पुनर्निर्माण का खर्च देना पड़ता है
4.4 भोजन संबंधी नियम
- पुरुष लाल बंगला के अंदर भोजन करते हैं
- महिलाएं बाहर बरामदे (परछी) में भोजन करती हैं
- महिलाएं सामान्यतः सार्वजनिक स्थानों पर भोजन नहीं करतीं
आज आवास भले बदल गए हों, पर लाल बंगला आज भी समुदाय की सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक बना हुआ है।
5. आजीविका एवं आर्थिक स्थिति
भुंजिया समुदाय की आजीविका परंपरागत रूप से वन आधारित थी, लेकिन अब उनकी आर्थिक व्यवस्था में बड़ा परिवर्तन आया है। वर्तमान में उनका जीवन कम आय, अस्थायी और मौसमी रोजगार पर आधारित है।
5.1 आजीविका के मुख्य स्रोत
- कृषि मजदूरीः अधिकांश परिवार अन्य समुदायों के खेतों में मजदूरी करते हैं। औसतन मजदूरी लगभग ₹150 प्रतिदिन है, जो अनियमित और अपर्याप्त है।
- मनरेगा रोजगारः मनरेगा के माध्यम से कुछ मौसमी रोजगार उपलब्ध होता है, लेकिन कार्य की निरंतरता नहीं रहती।
- लघु वनोपज संग्रहः महुआ और तेंदूपत्ता जैसे उत्पाद आज भी आय का स्रोत हैं।
- महुआ एकत्र कर उपयोग एवं बिक्री
- तेंदूपत्ता संग्रह सीमित अवधि के लिए
5.2 आजीविका संबंधी प्रमुख समस्याएं
- वनों में संसाधनों की कमी
- तेंदूपत्ता संग्रह की अवधि घटकर लगभग एक सप्ताह रह जाना
- भूमि स्वामित्व का अभाव
- मजदूरी पर अत्यधिक निर्भरता
5.3 पुरुष एवं महिलाओं की भूमिका
- पुरुषः मजदूरी, कृषि कार्य, ड्राइविंग एवं पलायन
- महिलाएं: कृषि मजदूरी, वनोपज संग्रह और घरेलू जिम्मेदारियां
आर्थिक अस्थिरता के कारण समुदाय को गरीबी, खाद्य असुरक्षा और विकास अवसरों की कमी का सामना करना पड़ता है।
6. भोजन की आदतें एवं पारंपरिक ज्ञान
भुंजिया समुदाय का भोजन जंगल और ऋतु आधारित था। वे कई प्रकार के जंगली कंद-मूल खाते थे जैसे—
- करू कंद
- गेठी कंद
- बिछली कंद
- चेरी कंद
- नागा कंद
ये उबालकर, सुखाकर या भूनकर उपयोग किए जाते थे। समुदाय मछली पकड़ता था और पक्षियों का शिकार भी करता था। महुआ का उपयोग पक्षी पकड़ने हेतु “लता” (चिपचिपा पेस्ट) के रूप में भी किया जाता था।
6.1 महुआ का महत्व
महुआ उनके भोजन, संस्कृति और आय का प्रमुख स्रोत है। इसे उबालकर, भूनकर, या पेस्ट बनाकर खाया जाता है।
6.2 संकट कालीन भोजन
भोजन संकट के समय वे कोधा रोटी (धान अवशेष से बनी रोटी) महुआ के साथ खाकर जीवन निर्वाह करते थे।
6.3 वर्तमान बदलाव
अब पीडीएस के कारण चावल मुख्य भोजन बन गया है। जंगल से भोजन की निर्भरता कम हो गई है। इससे पारंपरिक भोजन विविधता और पोषण संतुलन में गिरावट का खतरा बढ़ गया है।
7. सामाजिक एवं सांस्कृतिक परंपराएं
7.1 विवाह व्यवस्था
- पहले कम उम्र में कांदा विवाह (10-12 वर्ष) होता था
- अब विवाह की आयु बढ़कर 20-21 वर्ष हो रही है
- विवाह का खर्च वर पक्ष उठाता है
- समुदाय सामूहिक सहयोग करता है (लकड़ी, पत्तल, श्रम)
- गोत्र नियमों के अनुसार अपने गोत्र में विवाह निषिद्ध है
7.2 पहनावा
पहले सफेद वस्त्र प्रचलित थे। अब आधुनिक वस्त्र सामान्य हैं, लेकिन त्योहारों और विवाह में पारंपरिक पोशाक पहनी जाती है।
7.3 गोदना (टैटू)
महिलाओं में गोदना विवाह से पहले आवश्यक माना जाता है। यह पहचान, सौंदर्य और भावनात्मक जुड़ाव का प्रतीक है।
7.4 भाषा
भुंजिया भाषा बुजुर्गों में अधिक प्रचलित है, लेकिन युवा पीढ़ी मुख्यधारा की भाषा की ओर बढ़ रही है। इससे भाषा के लोप का खतरा है।
8. लैंगिक भूमिकाएं एवं परंपराएं
- पुरुष आजीविका, निर्माण कार्य एवं निर्णय प्रक्रिया में अधिक सक्रिय
- महिलाएं घर, बच्चों और मजदूरी दोनों में योगदान देती हैं
8.1 रसोई नियम
- पुरुष लाल बंगला में खाते हैं
- महिलाएं बाहर परछी में
8.2 मासिक धर्म नियम
महिलाओं को मासिक धर्म के समय लाल बंगला में प्रवेश निषिद्ध है। हालांकि इससे उन्हें कुछ विश्राम भी मिलता है।
8.3 प्रसव के बाद देखभाल
भुंजिया समाज की एक सकारात्मक परंपरा यह है कि प्रसव के बाद महिला को लगभग 2.5 महीने का विश्राम दिया जाता है और पुरुष खाना बनाकर घर संभालते हैं।
यह परंपरा महिलाओं के स्वास्थ्य को लेकर समुदाय की समझ को दर्शाती है।
9. धार्मिक विश्वास एवं देवी-देवता
लाल बंगला में पारिवारिक देवी-देवताओं की पूजा होती है। गांव स्तर पर भी देवी-देवता पूजे जाते हैं जैसे—
- शीतला माता (स्वास्थ्य और रक्षा देवी)
- ठाकुर देव (गांव रक्षक देवता)
समुदाय में प्रकृति पूजा का भी विशेष महत्व है। पेड़ काटने से पहले अनुमति लेने की परंपरा उनके पर्यावरणीय धार्मिक विश्वास को दर्शाती है।
10. पारंपरिक शासन व्यवस्था एवं सामाजिक नियम
भुंजिया समुदाय में परंपरागत शासन व्यवस्था बुजुर्गों द्वारा संचालित होती है। यह व्यवस्थाः
- विवाद समाधान
- नियम पालन
- परंपरा संरक्षण
- सामाजिक अनुशासन बनाए रखने में मदद करती है
लाल बंगला से संबंधित नियम सबसे कठोर हैं। उल्लंघन होने पर दंड स्वरूप पुनर्निर्माण खर्च देना पड़ता है।
11. शिक्षा एवं जनसांख्यिकीय स्थिति
जनगणना 2011 के अनुसारः
- कुल जनसंख्याः 10,603
- लगभग 138 गांवों में निवास
- लगभग 2,130 परिवार
11.1 लिंगानुपात
- 1029 महिलाएं प्रति 1000 पुरुष (सकारात्मक संकेत)
11.2 साक्षरता
- साक्षरता लगभग 60%
- प्राथमिक स्तर पर नामांकन बढ़ा है
- लेकिन माध्यमिक और उच्च शिक्षा में निरंतरता कम है
मुख्य कारणः
- भाषा बाधा
- आर्थिक दबाव
- स्कूल दूरी
- मार्गदर्शन की कमी
12. प्रमुख चुनौतियां
भुंजिया समुदाय के सामने निम्नलिखित मुख्य चुनौतियां हैं:
12.1 वन आधारित आजीविका का क्षय
वन कटाई और संसाधनों की कमी से वनोपज और भोजन दोनों प्रभावित हुए हैं।
12.2 पारंपरिक ज्ञान का लोप
नई पीढ़ी में पारंपरिक ज्ञान हस्तांतरण कमजोर हो रहा है।
12.3 भूमि स्वामित्व की कमी
अधिकांश परिवारों के पास कृषि भूमि नहीं है, जिससे आत्मनिर्भरता घट गई है।
12.4 आर्थिक अस्थिरता
मजदूरी आधारित रोजगार अस्थायी और कम आय वाला है।
12.5 सांस्कृतिक क्षरण
भाषा, रीति-रिवाज और परंपराओं में युवाओं की रुचि घट रही है।
ये सभी समस्याएं आपस में जुड़ी हुई हैं और एक-दूसरे को बढ़ाती हैं।
13. निष्कर्ष
भुजिया (भुजिया) समुदाय, जो कि एक विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (PVTG) है, अपनी समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं, स्वदेशी ज्ञान प्रणाली और प्रकृति आधारित जीवनशैली के कारण अत्यंत महत्वपूर्ण समुदाय है। उनकी परंपराएं जैसे लाल बंगला, गोत्र आधारित सामाजिक व्यवस्था, सामूहिक सहयोग और वन आधारित खाद्य प्रणाली उनकी विशिष्ट पहचान को दर्शाती हैं।
हालांकि वर्तमान समय में यह समुदाय गंभीर बदलाव के दौर से गुजर रहा है। वन संसाधनों की कमी, परंपरागत आजीविका का नुकसान, मजदूरी पर निर्भरता, भूमि स्वामित्व की कमी और युवाओं में सांस्कृतिक दूरी ने समुदाय को आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर बनाया है।
इन परिस्थितियों में अत्यंत आवश्यक है कि भुजिया समुदाय के लिए सांस्कृतिक रूप से संवेदनशील और समुदाय आधारित प्रयास किए जाएं। विशेष रूप से निम्न कार्य आवश्यक हैं:
- स्वदेशी ज्ञान और परंपराओं का दस्तावेजीकरण एवं संरक्षण
- सतत आजीविका अवसरों को बढ़ावा देना
- पीढ़ियों के बीच ज्ञान हस्तांतरण को मजबूत करना
- युवाओं को सांस्कृतिक नेतृत्वकर्ता और परिवर्तनकारी भूमिका में विकसित करना
यदि ऐसे प्रयास किए जाएं तो भुजिया समुदाय न केवल अपनी सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रख पाएगा, बल्कि सम्मानजनक और टिकाऊ विकास की दिशा में भी आगे बढ़ सकेगा।
रिपोर्ट तैयारकर्ताः संजय शर्मा