हांगडी खेती: किसान पाठशाला प्रशिक्षण मार्गदर्शिका

हांगडी खेती: किसान पाठशाला प्रशिक्षण मार्गदर्शिका

Published on January 14, 2026

हिन्दी

Summary

यह किसान पाठशाला प्रशिक्षण मार्गदर्शिका 'हांगडी खेती' (मिश्रित खेती) पर केंद्रित है। इसमें टिकाऊ कृषि, जल-उपयोग अनुकूलन, जैविक कीट प्रबंधन, और पारंपरिक बीज संरक्षण की विधियों का विस्तृत वर्णन है।

माही बेसिन में सतत कृषि के लिए जल-उपयोग अनुकूलन कार्यक्रम

सत्र सारणी

क्र.सं.सत्रसमय1हमारे जीवन पर खेती में आये बदलाव के प्रभाव का पारिस्थितिकी तंत्र के संदर्भ में विश्लेषण (मानव, मृदा, जल और पर्यावरण)3.00 घंटा2किसान खेत पाठशाला की अवधारणा, प्रक्रिया का परिचय, सहभागी किसानो तथा सहजकर्ता की भूमिका और उनके उत्तरदायित्व को लेकर समझ विकसित करना3.00 घंटा3हांगडी खेती की अवधारणा वर्तमान परिदृश्य में हांगडी खेती की आवश्यकता, महत्त्व एवं उपयोगिता पर समझ बनाना3.00 घंटा4हांगडी खेती तंत्र की स्थापना करने के लिए अभ्यास सहभागी किसानो के पास उपलब्ध संसाधनों का विश्लेषण करना सभी सहभागी किसानो के खेतो की योजना विकसित करना3.00 घंटा5खेत तैयारीः गर्मियों में खेत की जुताई खेत से कृषि अवशेष इत्यादि का निष्पादन खेत सुधार संबंधी कार्य जैसे समतलीकरण, खेत तालाब निर्माण मृदा में नमी संरक्षण हेतु मेढ़बंदी, ट्रेंच इत्यादि का निर्माण3.00 घंटा6गुणवत्तापूर्ण बीजो का चयन एवं बीजोपचार गुणवत्तापूर्ण बीजो का चयन बीज उपचार की विधिः बीजामृत3.00 घंटा7हांगडी खेती अंतर्गत मृदा में नमी संरक्षण हेतु की जाने वाली अंतःशस्य क्रियाएं निराई-गुड़ाई पौध से पौध के मध्य निश्चित अन्तराल हेतु थिनिंग करना विभिन्न विधियों से मल्चिंग (भूमि अच्छादन)3.00 घंटा8हांगडी खेती अंतर्गत पोषण एवं एकीकृत कीट प्रबंधन कम्पोस्टिंग - गोबर खाद केंचुआ खाद जीवामृत मटका खाद नीमास्त्र ब्रह्मास्त्र आग्नेयास्त्र दशपर्णी अर्क3.00 घंटा9हांगडी खेती तंत्र अंतर्गत प्रथम स्तर के उत्पादन का आंकलन3.00 घंटा10हांगडी खेती तंत्र अंतर्गत द्वितीय स्तर के उत्पादन का आंकलन3.00 घंटा11हांगडी खेती तंत्र अंतर्गत तृतीय स्तर के उत्पादन का आंकलन3.00 घंटा12परम्परागत विधि से बीज का संरक्षण3.00 घंटा13हांगडी खेती से प्राप्त कुल उत्पादन का, दुसरे खेत से प्राप्त उत्पादन से तुलनात्मक आंकलन3.00 घंटा14हांगडी खेती प्रक्रिया की मुख्य सीखों का संकलन एवं किसान पाठशाला को बेहतर बनाने के लिए किसानो से सुझाव लेना3.00 घंटा

सहजकर्ता के लिए निर्देश

  1. किसान खेत पाठशाला में 2 जल स्वराजी एवं 15 किसानो को सम्मिलित करे।

  2. खेत पाठशाला के सत्रों का आयोजन अनिवार्य रूप से सहभागी किसानो के खेत पर आयोजित करे।

  3. प्रत्येक बैठक के आयोजन से पूर्व सभी किसानो की उपस्थिति एवं सक्रिय सहभागिता सुनिश्चित करे।

  4. बैठक से पूर्व सत्र की तैयारी करे तथा यह सुनिश्चित करे कि गुणवत्तापूर्ण सामग्री पाठशाला के स्थान पर पहले से उपलब्ध है।

  5. सत्र क्रमांक 7 एवं 8 में दिए गए प्रायोगिक कार्यो को आवश्यकता अनुसार या कीट व्याधि होने की स्थिति में आयोजित किया जा सकता है।

  6. दिए गए प्रपत्र केवल उदहारण स्वरुप है, किसान खेत पाठशाला के प्रतिवेदन रजिस्टर में प्रपत्र अनुसार तालिका निर्माण कर वांछित जानकारी दर्ज करे।

सत्र 1 : हमारे जीवन पर खेती में आये बदलाव के प्रभाव का विश्लेषण (मानव, मृदा, जल और पर्यावरण)

  1. आपके दादा जी के समय खेती, खेती के तरीके, लागत और उत्पादन की स्थिति पर चर्चा से प्राप्त बिन्दुओ का दस्तावेजीकरण।

  2. आपके पिता जी के समय के समय खेती, खेती के तरीके, लागत, उत्पादन पर चर्चा से प्राप्त बिन्दुओ का दस्तावेजीकरण।

  3. वर्तमान में की जा रही खेती, खेती के तरीके, लागत, उत्पादन की स्थिति पर चर्चा से प्राप्त बिन्दुओं का दस्तावेजीकरण।

  4. वर्तमान में की जा रही खेती और आपके दादा जी के समय की जा रही खेती से प्राप्त भोजन और पोषण की स्थिति में आए बदलाव पर चर्चा से प्राप्त बिन्दुओं का दस्तावेजीकरण।

संवाद के बिन्दुपहलेअबखेती का आधारपरिवार की आवश्यकताओं पर आधारित खेतीबाजार आधारित खेतीफसलविविधतापूर्ण फसलेएकल फसल एवं उत्पादन में अनिश्चिततामिट्टीउपजाऊ मिट्टीलगातार अनुपजाऊ होती मिट्टीजल की स्थितिस्वच्छ जल, जलस्त्रोतों में 12 माह जल की उपलब्धताघटता जल स्तर, प्रदूषित होता जलभोजन की स्थितिस्थानीय एवं विविधतापूर्ण पौष्टिक भोजननिःस्वाद एवं एकल भोजनजैव विविधतापर्याप्त जैव विविधतालगातार घटती जैव विविधतारोग/स्वास्थ्य समस्याएंस्वस्थ और निरोगी जीवनरक्तचाप, हृदयाघात, मधुमेह, कैंसर आदिप्रदुषण की स्थितिपशु आधारित खेती, कोई प्रदुषण नहीलगातार बढ़ता प्रदुषण

इन बिगड़ती परिस्थितियों का कारण क्या आप जानते है?

  1. जहरीले कीटनाशक

  2. रासायनिक खाद

  3. असंतुलित पोषण और गलत खाद्य आहार का चुनाव

  4. बाजार आधारित खेती (नगदी फसल)

  5. गहरी जुताई (ट्रेक्टर से)

उपरोक्त सभी कारणों से हम सभी का (जल, पर्यावरण, मिट्टी, पशु और मानव) स्वास्थ्य पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है। जिस प्रकार हम बीमार होने पर अपने स्वास्थ्य को बेहतर करने के लिए क्या-क्या करते है।

  1. डॉक्टर से मिलते है।

  2. रक्त परिक्षण करवाते है।

  3. दवाई एवं विटामिन का सेवन

  4. फल का सेवन

  5. पोषण से भरपुर भोजन का सेवन

इसी तरह हमें यदि जल, पर्यावरण, मिट्टी, पशु और मानव आदि को स्वस्थ्य रखना है तो हमें हमारी खेती को भी सुधारना होगा। तो आइये हम इस मार्गदर्शिका के माध्यम से जानते है कि कैसे हम हमारी खेती को जलवायु अनुकूल, जल दक्षतापूर्ण एवं खाद्य तथा पोषण से भरपूर बना सकते है।

सत्र 2 : किसान खेत पाठशाला... एक परिचय

किसान खेत पाठशाला क्या है?

किसान खेत पाठशाला कृषि क्षेत्र में नवाचार, पारंपरिक तकनीकी ज्ञान और कौशल को बढ़ावा देती हैं। यह पाठशाला किसानों को हांगडी खेती की विभिन्न तकनीकों को, जो जल हितेषी एवं पर्यावरण अनुकूल है को सिखाती है साथ ही बेहतर फसल प्रबंधन एवं उत्पादन के साथ सामाजिक-आर्थिक मुद्दों में प्रशिक्षित करती है। पाठशाला के माध्यम से सहभागी किसान सामूहिक प्रयासों से अपनी खेती को लगातार बदलते पर्यावास एवं घटते जल स्तर जैसी विषम परिस्थितियों में भी संवहनीय बनाने का प्रयास करते है। किसान खेत पाठशाला एक नूतन, सहभागी विश्लेषण का तरीका है जिसका जोर समस्या समाधान और खोज आधारित सीख पर होता है। किसान खेत पाठशाला का उद्देश्य उनके उत्पादन तंत्र का विश्लेषण, समस्या की पहचान, संभावित समस्याओं का परिक्षण कर समाधान खोजने की क्षमता विकसित करना है, और अंत में उनके खेती तंत्र के लिए उपयुक्त, सर्वश्रेष्ठ अभ्यासों को अपनाने के लिए प्रेरित करना है। (FAO-2003)

वर्तमान परिप्रेक्ष्य में किसान खेत पाठशाला की आवश्यकता क्यों है ?

  1. किसान खेत पाठशाला, किसान को एक अवसर भी प्रदान करता है कि वह टिकाऊ-भूमि उपयोग की तकनीकों का मूल्यांकन/जांच कर सके और अपनी कृषि विरासत के परम्परागत तरीकों के साथ उनकी तुलना करके उपयुक्त तरीके की पहचान करें और उनको अपनाए।

  2. किसान खेत पाठशाला एक समयबद्ध गतिविधि है, जो सामान्यतः एक फसल चक्र या एक उत्पादन काल के साथ जुडी होती है। किसान खेत पाठशाला में किसानों का एक समूह हिस्सा लेता है जिसमे प्रायः 15-20 किसान सम्मिलित होते है।

  3. प्रस्तुतीकरण और सामूहिक निर्णय व क्रियान्वन के अभ्यास किये जाते हैं।

  4. इस पाठशाला का मुख्य घटक खेत है एक सहभागी तुलनात्मक प्रयोग को स्थापित करना या इसे सहभीग तकनिकी विकास भी कहा जाता है, जहाँ खेत-पाठशाला के विचार को किसान अपने अभ्यास में अपना लेते हैं।

  5. सहभागी तुलनात्मक प्रयोग को विकास से जुड़े किसी भी विषय के लिए काम में ले सकते हैं जैसे खेती, पशुपालन, कुम्हारी, लोहारी, आदि।

  6. खेत ही सीखने और सीखाने का स्थान है: खेत-पाठशाला कार्यक्रम में सीखने का स्थान होता है "खेत” इसमें दो तरीके अपनाये जाते हैं।

(अ) प्रथम तरीका एक किसान का खेत पाठशाला का काम करता है, जहाँ सभी समूह सदस्य आकर खेत पाठशाला से सीखते है।

(ब) दूसरा तरीका सभी किसान अपने अपने खेत को पाठशाला से मिली सीख के अनुरूप विकसित करने का काम करते है एवं सभी सदस्य स्वयं खेत एवं एक दुसरे के खेत में सीखते है।

सहभागी किसानो की भूमिकाः

किसान खेत पाठशाला में सहभागी किसानों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है। किसान खेत पाठशाला में सहभागी किसान अपने अनुभवों, ज्ञान और विचारों को एक दुसरे के साथ साझा कर सीखने-सीखाने का अवसर प्रदान करते हैं। दुसरे किसानो के अनुभवों से सीख लेकर उसे अपने खेत में अपनाते है और अन्य किसानों को प्रेरित करते हैं। किसान पाठशाला में भाग लेने वाले किसानो को विभिन्न सत्रों के माध्यम से नवाचारिक तकनीकों से अवगत होते है एवं खेती किसानी से जुडी विभिन्न समस्याओं का व्यवहारिक हल प्राप्त करते है। इससे किसान सीखते हैं कि कैसे उनकी खेती में योजना बनानी चाहिए, किस तकनीक का उपयोग करना चाहिए, और कैसे वे अपनी खेती को जलवायु अनुकूल एवं जल हितेषी बना सकते है।

सहजकर्ता की भूमिकाः

किसान खेत पाठशाला में सहजकर्ता किसानों को हांगडी खेती पद्धति के अंतर्गत खेत तैयारी से लेकर फसल संग्रहण तक की विभिन्न अवस्थाओं में सहायता और मार्गदर्शन प्रदान करता हैं। सहजकर्ता का मुख्य उद्देश्य किसानों को खेती से जुड़े विभिन्न आयामों जैसे कि सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, पर्यावरणीय पहलुओं से अवगत कराता है साथ ही हांगडी खेती से जुडी नवाचारिक तकनीकों, फसल प्रबंधन, विपणन और अन्य कृषि संबंधित मुद्दों के बारे में समझ बनाने एवं उनसे निपटने में सक्षम बनाने हेतु किसानो का मार्गदर्शन करता है ताकि वे अधिक उत्पादक और लाभकारी हो सकें। सहजकर्ता पाठशाला के दौरान किसानो के हित में संचालित विभिन्न सरकारी योजनाओं के बारे में भी जानकारी प्रदान करता हैं ताकि किसान समग्र रूप से अपनी खेती को लाभकारी बना सके। इस प्रकार, सहजकर्ता किसानों के लिए एक महत्वपूर्ण संवेदनशील और सहायक संसाधन हैं, जो उन्हें स्वतंत्र और सशक्त बनाने में सहायक हैं।

सत्र 3 : वर्तमान परिदृश्य में हांगडी खेती की अवधारणा आवश्यकता, महत्व एवं उपयोगिता पर समझ बनाना

खेत में विभिन्न फसलों की बुवाई का तरीका

Figure 1: Combination of crops and food groups

फसल का नामभिण्डीमक्काअरहरमूंगफलीउड़दचवलाझालरतिल

"हांगडी खेती ऐसी कृषि पद्धति जिसमे खरीफ सीजन में एक साथ विभिन्न प्रकार के बीजो की बुवाई परंपरागत तरीके से की जाती है तथा अलग-अलग समयांतराल पर फसल उत्पादन लिया जाता है।" हांगडी खेती एक प्रकार की मिश्रित खेती पद्धति है जिसमे अलग अलग प्रकार के बीजो की बुवाई एक साथ खरीफ सीजन के प्रारंभ में की जाती है यह बुवाई इस प्रकार की जाती है कि बोई गयी फसले एक-दुसरे के लिए पूरक होती है। कुछ फसले दूसरी फसल को बढ़ने के लिए सहारा, पोषण, कीट आदि से सुरक्षा प्रदान करने का कार्य करती है। यह खेती पद्धति पर्यावरण हितैषी, लाभ प्रदान करने वाली कृषि पद्धति के रूप में स्थापित है। इसका मुख्य उद्देश्य परिवार की खाद्य एवं पोषण सुरक्षा को सुनिश्चित करना है यह अनाज, दलहन, तिलहन एवं अन्य फसलों की विविधता को परिवार के लिए उपलब्धता सुनिश्चित करती है। हांगडी खेती के तहत, किसान एक ही खेत में अलग-अलग प्रकार की फसलें उगाते हैं, जो उन्हें विभिन्न रोगों, कीटों और पर्यावरणीय परिणामों के प्रति सामर्थ्यवान बनाती है। हांगडी खेती की आवश्यकता वर्तमान परिदृश्य में बहुत अधिक है। यह खेती का एक सुगम और उपयुक्त तरीका है जो किसानों को समृद्धि और सुरक्षा की दिशा में आगे बढ़ने में मदद करता है।

हांगडी खेती पद्धति को अपनाने के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं।

  • प्राकृतिक संतुलन की रक्षा : हांगडी खेती से किसान खेत के मौजूदा प्राकृतिक संतुलन को बनाए रखते हैं। यह बदलते जलवायु परिप्रेक्ष्य में मिट्टी की उर्वरकता और पोषण के स्तर में सुधार कर सुनिश्चित उत्पादन प्रदान करती है।

  • जोखिम की कमी : यदि किसान केवल एक ही फसल की खेती करता है तो वह उस फसल पर पूर्ण रूप से आश्रित हो जाता है और प्राकृतिक आपदा या कीट प्रकोप होने की स्थिति में फसल नष्ट हो जाती है तो उसका बहुत नुकसान उठाना पड़ता है। हांगडी खेती में, अगर एक फसल असफल होती है, तो दूसरी फसलें फिर भी उपज प्रदान करती हैं, जिससे नुकसान कम होता है।

  • खाद्य विविधता : विभिन्न फसलों की खेती से, किसान अपनी खाद्य सुरक्षा और आजीविका को भी बढ़ा सकता है। वे अधिशेष फसल उत्पादों को बाजार में बेचकर अधिक लाभ कमा सकते हैं।

  • मौसम की अनियमितता का प्रभाव कम करना : विभिन्न फसलों की खेती से, किसान मौसम की अनियमितता का सामना कर सकता है। कुछ फसलें अच्छे मौसम में उत्पन्न होती हैं जबकि कुछ फसले मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियों में भी किसान को लाभ प्रदान करने में सक्षम होती है।

  • हांगडी खेती की उपयोगिता यह है कि यह किसानों को समृद्धि और सुरक्षा की दिशा में आगे बढ़ने में मदद कर सकती है और उन्हें विभिन्न सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय संबलता प्रदान कर सकती है।

सत्र 4 : हांगडी खेती तन्त्र स्थापना के लिए अभ्यास

मौसमी मानचित्रण

(A table with rows for खाद्यान, चारा, जलावन, पेयजल, खेत जल प्रबंधन, नगदी and columns for different seasons represented by images)

सहभागी किसानों के पास उपलब्ध संसाधनों का विश्लेषण करना।

प्रक्रिया के चरण :

  1. किसानों के साथ चार्ट पेपर पर मौसमी केलेंडर तैयार करना।

  2. पहली पंक्ति में तीन मौसम का चित्र दिखाया गया है जो हमारे स्थानीय मौसम के अनुसार है।

  3. निचे दिए गए कॉलम में क्रमशः भोजन, चारा, जलावन, पेयजल, सिंचाई और नगदी की स्थिति दी गई है, सहभागी किसानो को प्रेरित करे कि उपलब्धता के आधार पर ग्रेडिंग करे जिसमे अच्छी उपलब्धता के लिए 3 अंक, सामान्य उपलब्धता के लिए 2 तथा कम उपलब्धता होने की स्थिति पर 1 तथा पूरी तरह से उपलब्ध नही होने पर 0 अंक प्रदान करे।

विवरणवर्षासर्दीगर्मीअनाजदलहनतिलहनसब्जियाँफलअनुपजाऊ भोज्य पदार्थचाराजलाऊ ईंधनपीने का पानीसिंचाईआय/नगदी

चर्चा के बिन्दु :

  1. उपरोक्त सामग्रियों की उपलब्धता या अभाव का समय क्या है?

  2. इस समय में आवश्यकताओ को पूरा करने के लिए क्या विकल्प हो सकते है?

  3. क्या आपने इस कमी को दूर करने के लिए कुछ सोचा है?

सभी सहभागी किसानों के खेतों की योजना विकसित करना है।

  1. प्रक्रिया के चरण: पिछले अभ्यास के आधार पर तैयार किये गए मौसमी केलेंडर के माध्यम से समीक्षा कर यह जानते है कि कौन-कौन से खाद्यान का अभाव किस मौसम में है।

  2. ऐसे खाद्यान्न जो कम मात्रा में उपलब्ध है या पूरी तरह से अनुपलब्ध है उनकी सूचि बनाकर सहभागियों के साथ इन खाद्यान्नों की कमी को कैसे दूर किया जा सकता है इस पर सामूहिक चर्चा करते है और खरीफ सीजन में फसल की कार्य योजना तैयार करते है।

फसल का नामअनाज/मोटा अनाजदलहनतिलहनमसालाफलसब्जियाँनगदी फसलस्वतः उगने वाली फसलचाराजलाऊ ईंधन

  1. फसल की कार्ययोजना के आधार पर आवश्यक बीजो की उपलब्धता पहले परिवार स्तर, फले स्तर और गाँव स्तर पर बीजो का आदान प्रदान कर की जाना चाहिए। सहभागी किसान अपने पास उपलब्ध अतिरिक्त बीजो को अन्य किसानो के साथ साझा कर सकते है और उनके पास जो बीज उपलब्ध नही है वह दुसरे किसान से ले सकते है। इस प्रकार हांगडी खेती के लिए बीजो की उपलब्धता सुनिश्चित की जा सकती है।

चर्चा के बिन्दु :

  1. हांगडी खेती में विविध प्रकार की फसले लगाई जाये तो परिवार को बेहतर पोषण, खाद्य सुरक्षा और अतिरिक्त उत्पादन के विक्रय से आमदनी मिल सकती है।

  2. यदि हम बेहतर तरीके से योजना बनाकर हांगडी खेती करे तो अपने परिवार की आवश्यकताओं को हम घरेलु स्तर पर ही पूर्ण कर सकते है। जैसे भोजन के लिए अनाज, दाल, तिलहन, सब्जियाँ, फल, पशुओं के लिए चारा, खेती की उर्वरकता एवं नमी में वृद्धि साथ ही पर्यावरण और जैव विविधता में सुधार होता है।

  3. हांगडी खेती उपलब्ध जल का समुचित उपयोग कर अधिकतम उत्पादन प्राप्त करने में सहायक होती है।

  4. लगातार हो रहे जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावो को कम करने में सहायता करती है एवं सीमांत किसानो के लिए खाद्य एवं पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करती है।

सत्र 5 : बुवाई पूर्व खेत तैयारी

गर्मियों में खेत की जुताई एवं कृषि अवशेष का निष्पादन

हांगडी खेती प्रणाली में खेत की तैयारी गर्मियों के मौसम से प्रारंभ होती है जिस खेत में हांगडी खेती की जाना है उस खेत में ग्रीष्मकाल के प्रारंभ में बैलो के माध्यम से जुताई करना चाहिए। इससे निम्नलिखित लाभ होते है।

  1. मृदा में जलधारण क्षमता में वृद्धि: गर्मी की जुताई से खेत में मृदा के सुराख खुल जाने से बारिश का पानी जमीन द्वारा सोख लिया जाता है। इससे मृदा की जल अवशोषण दर बढ़ जाती है व नमी काफी मात्रा में लंबे समय तक खेत में मौजूद रहती है। यह नमी खरीफ की फसल के उत्पादन में काम आती है। खेत में जुताई करने से मृदा के भौतिक गुणों में सुधार होता है।

  2. जड़ विकास में सहायक: बार-बार एक ही गहराई पर जुताई करने से उस गहराई पर एक कठोर सतह का निर्माण हो जाता है। खेत की इस कठोर तह को तोड़कर मृदा को जड़ों के विकास के अनुकूल बनाने में ग्रीष्मकालीन जुताई लाभदायक होती है।

  3. हानिकारक कीटों से बचाव: गर्मी की जुताई से हानिकारक कीटों के अंडे व लार्वा, जो जमीन की दरारों में छिपे होते हैं, वे जुताई करने से तेज धूप के संपर्क में आकर नष्ट हो जाते हैं। इससे खेत, कीट-पतंगों से सुरक्षित हो जाता है और अगली फसल में कीटों के हमले की आशंका कम हो जाती है

  4. खरपतवार नियंत्रण: विभिन्न प्रकार की खरपतवारों जैसे-कांस, मोथा, दूध आदि की जड़ें काफी गहराई तक जाती हैं। वे धुप के संपर्क में आने से नष्ट हो जाती है। खरपतवार के बीज भी धुप में आने या जमीन की गहराई में चले जाने से अंकुरित नही हो पाते है।

  5. मृदा वायु संचार में बढ़ोतरी: गर्मियों में जुताई करने से मृदा काफी उलट-पलट होती है, जिससे उसमें वायु के प्रवाह के लिए रिक्त स्थान बन जाते है जो कि वायु के प्रवाह को बढाने में सहायक होते है।

  6. मृदा संरचना में सुधार: गर्मियों की जुताई में मृदा एकान्तरण से सुखाने और शीतलन के कारण मृदा की संरचना में सुधार होता है।

  7. जुताई से उपज में इजाफा: इससे फसल उत्पादन में भी वृद्धि होती है

  8. जीवांश खाद की प्राप्ति: गर्मी के समय में रबी व जायद की फसल कट जाने के बाद खेत की जुताई करने से फसल के अवशेष, डंठल व पत्तियां आदि मृदा में दब जाते हैं, जो बारिश के मौसम में सड़कर जमीन को जीवांश पदार्थ मुहैया करवाते हैं।

खेत सुधार संबन्धित कार्य

हांगडी खेती पद्धति में खेत की संरचना में सुधार संबंधित कार्य जैसे कि खेत समतलीकरण, खेत तालाब, मेढ़बंदी, ट्रेंच निर्माण इत्यादि जैसे कार्य किये जाये इससे खेती संबंधी कार्य को संपादित करने में सहायता मिलती है साथ ही खेत की मृदा में लम्बे समय तक नमी बनी रहती है जो कि फसल के उत्पादन को बढाने में मदद करती है।

सत्र 6 : गुणवत्तापूर्ण बीजो का चयन एवं बीजोपचार

चर्चा के बिन्दु

  1. फसल की कार्ययोजना के अनुसार आवश्यक परंपरागत बीजो की उपलब्धता सुनिश्चित कर लेना चाहिए इस हेतु परिवार स्तर पर उपलब्ध परंपरागत बीजो को साफ करना, ग्रेडिंग कर स्वस्थ्य बीजो को प्रथक कर लेना चाहिए।

  2. इसी प्रकार जो बीज परिवार स्तर पर उपलब्ध नही है तो उसे फले स्तर और गाँव स्तर से जुटा लेना चाहिए।

  3. इस हेतु फले एवं गाँव स्तर पर बीजो का आपस में आदान प्रदान किया जाना चाहिए।

  4. सहभागी किसान अपने पास उपलब्ध अतिरिक्त बीजो को अन्य किसानो के साथ साझा कर सकते है व उनके पास जो बीज उपलब्ध नही है वह दुसरे किसान से ले सकते है।

  5. दुसरे किसानो से प्राप्त परंपरागत बीजो को भी साफ कर ग्रेडिंग करना चाहिए एवं स्वस्थ्य बीजो को प्रथक कर लेना चाहिए। इस प्रकार हांगडी खेती के लिए बीजो की उपलब्धता सुनिश्चित की जा सकती है।

बीज अंकुरण परिक्षण

उपलब्ध परंपरागत बीजो को खेत में बुवाई करने से पहले बीज अंकुरण प्रतिशत जांचने के लिए अंकुरण परिक्षण कर लेना चाहिए। इसके लिए सर्वप्रथम 10 बीजो को लेकर कतार में बुवाई करते है और निश्चित दिनों के अन्तराल के बाद कितने बीज अंकुरित हुए है उसका अवलोकन करने से बीज के अंकुरण प्रतिशत का अनुमान लगाया जा सकता है।

बीजामृत द्वारा बीजोपचार

एक सूती कपडे में पाच किलों गोबर रख कर एक बाल्टी में तीन चौथाई पानी भर कर इस कपडे में रखे गोबर को बाध कर पानी में लटकाए। बारह घण्टे बाद इस पानी को उपयोग हेतु सुरक्षित करें तथा कपडे में लिपटे गोबर को फेंक दे। एक अलग बर्तन में एक लीटर पानी में 50 ग्राम चूना मिलाकर स्थिर होने को रख देवें। 13 घण्टे बाद गोबर पानी चूना पानी मिलाकर 50 ग्राम जंगल की मिट्टी और गौमूत्र मिला दे। इस घोल को पतला करने के लिये 10 लीटर पानी मिलाया जा सकता है। 13 घण्टे के पश्चात इस घोल को कपडे से छानकर प्राप्त जलीय घोल से बीजोपचार करे। उपचारित बीज को छाव में फैलाकर सुखाना अनिवार्य है। इस प्रकार से बीजोपचारित करने पर अनेक जड एवं मृदा जनित रोगों से बचाव होता है।

सत्र 7 : हांगडी खेती अंतर्गत मृदा में नमी संरक्षण हेतु की जाने वाली अंतःशस्य क्रियाएं

चर्चा के बिन्दु

फसलो को स्वस्थ रखने और खेत में नमी बनाये रखने के लिए निराई - गुड़ाई बहुत ही महत्वपूर्ण है। निराई गुड़ाई से पौधों की कतारों के बीच उगने वाले अवांछित खरपतवारों इत्यादि को खेत से बाहर करते है। समय समय पर निराई गुढ़ाई करने से निम्नलिखित लाभ होते है।

  1. फसलों में लगातार निराई गुड़ाई करते रहने से फसल की देखभाल अच्छी हो जाती है साथ ही फसल स्वस्थ्य एवं उत्पादन अधिक होता है।

  2. निराई गुड़ाई से खेतों में हवा का संचार बना रहता है जिससे पौधे के जड़ों की वृद्धि और विकास अच्छा होता है, फलस्वरुप पौधा मिट्टी में अच्छी पकड़ के साथ खड़ा रहता है।

  3. लगातार समय-समय पर निराई गुड़ाई करते रहने से पोषक तत्व तथा जैविक खाद मिट्टी में अच्छी तरह से मिल जाते हैं जिससे पोषक तत्व पौधे को आसानी से उपलब्ध हो जाता है।

  4. मृदा में हवा के संचार के साथ लाभदायक एरोबिक बैक्टीरिया की सक्रियता बढ़ जाती है जिससे अधिक मात्रा में पोषक तत्व पौधों को उपलब्ध हो पाता है।

  5. फसलों में निराई गुड़ाई करते रहने से खर-पतवार तथा अन्य बाध्य तत्व से मिट्टी प्रभावित नहीं होती और फसल बिना किसी तनाव एवं दबाव से अपनी वृद्धि हो पाती है।

  6. निराई गुड़ाई से प्रकाश का संचार भी भरपूर हो जाता है जिससे हानिकारक मृदा जनक रोग अत्यधिक नहीं पनपते हैं।

  7. निराई गुड़ाई करने से सूक्ष्म जीवो की सक्रियता पौधों की जड़ों के पास बनी रहती है जिससे जटिल से जटिल यौगिक मृदा जल में आ जाते हैं जिनका अवशोषण पौधों के द्वारा आसानी से कर लिया जाता है।

पौध से पौध के मध्य निश्चित अन्तराल हेतु थिनिंग करना

खेत में सभी पौधों की ठीक से वृद्धि हो इस हेतु छटनी की जाती है जिसमे पौधों से पौधों के बीच पर्याप्त दुरी रखने के लिए हाथो से पास पास में उग आये पौधों को निकाल कर पर्याप्त दुरी पर लगाते है। इस प्रक्रिया को थिनिंग कहते है। इस प्रक्रिया का यह लाभ होता है कि पर्याप्त दुरी होने पर सभी पौधों को पर्याप्त मात्रा में सूर्य का प्रकाश, हवा, नमी एवं मृदा से पोषण की प्राप्ति होती है जिससे पौधों का विकास एक समान होता है। पौधों के मध्य पर्याप्त दुरी रखने से पौधों की वृद्धि अच्छे से होती है।

विभिन्न विधियों से मल्चिंग

मुख्य सन्देश: पलवार या मल्चिंग एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमे खुली मिट्टी को विभिन्न सामग्रीयों जैसे घास-फुंस, पत्तियों, पत्थरों आदि के माध्यम से एक परत बनाकर ढक दिया जाता है। मल्चिंग करने से ऐसी खरपतवारे जिनके बीजो को अंकुरित होने के लिए प्रकाश की आवश्यकता होती है वे सूर्य प्रकाश नहीं मिलने के कारण अंकुरित नही होते है। मल्चिंग करने से मृदा के कटाव को रोकने में सहायता मिलती है, मृदा में नमी बनी रहती है मृदा में उपस्थित सूक्ष्मजीवों की संख्या में वृद्धि होने से उर्वरता में भी सुधार होता है। मिट्टी की नमी और पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ने से फसलों की वृद्धि भी अपेक्षाकृत अधिक होती हैं।

चर्चा के बिन्दु

मल्चिंग करने से निम्नलिखित लाभ होते है।

  1. मिट्टी में नमी बनाए रखता है, जिससे पौधों को बेहतर विकास में मदद मिलती है।

  2. खरपतवारों को बढ़ने से रोकता है, जिससे खेत की निराई-गुड़ाई में कम समय लगता हैं।

  3. घास-फुंस, पत्तियों आदि से मल्चिंग करने पर इनमें मौजूद पोषक तत्व धीरे धीरे अपघटित होकर मृदा में मिलते है जिससे मृदा में पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ती है जो फसल को मिलती है जिससे वे मजबूत होते हैं और रोग के प्रति अधिक प्रतिरोधी बनते हैं।

  4. मिट्टी को पकड़कर कटाव को रोकने में भी मदद करते हैं। सूक्ष्म जीवो की गतिविधियाँ बढ़ने से मृदा मुलायम तथा नमी युक्त होने लगती है जो पौधों के विकास में सहायक होते है।

सत्र 8 : हांगडी खेती अंतर्गत पोषण एवं एकीकृत कीट प्रबन्धन

हांगडी खेती अंतर्गत बेहतर फसल उत्पादन के लिए पोषण एवं एकीकृत कीट प्रबंधन के लिए निम्न उपाय किये जा सकते है।

कम्पोस्टिंग

प्रक्रिया : कम्पोस्ट के लिए प्रयोग किये जाने वाले पदार्थ सामान्यत किसी प्रकार के वनस्पति और जैविक पदार्थ जिसमे फसल के अवशेष, कटाई के बाद के पौधों की छंटाई से मिले अवशिष्ट, फल व सब्जियों का अवशेष इत्यादि। हवा, नमी, तापमान, पीएच, कार्बन-नत्रजन अनुपात आदि प्रयोग में लाये जाते है।

कम्पोस्ट बनाने के चरण

  1. कम्पोस्ट को उपयोग मे लाकर 8 ईन्च (30 सेमी) मोटाई वाली नमीयुक्त परत बनाते हैं।

  2. लगभग 3 ईन्च (5 सेमी) मोटा पशुमल (गोबर) का एक परत बनाते हैं।

  3. आधार पदार्थ (राख, चूना या अन्य) की एक परत लगाते हैं, इसमे राख डालने पर पोटेशियम की पूर्ति होती है और चुना केल्शियम हेतु मिलाते है।

  4. ढेर में हवा संचरण के लिये 1 से 3 गज की दूरी पर कुछ लकडी की डंडियाँ लगाते हैं, जिनको तीन-चार दिनों के बाद निकाल लेते हैं। धान, शकरकन्द व अन्य फसलों के कचरे को ठीक से काटकर उसकी परत दर परत तब तक लगाते हैं कि उसकी ऊंचाई 1 से 1.5 गज न हो जावे।

  5. प्रति परत के बाद कम्पोस्ट को गीला करते है ताकि उसमे नमी बनी रहे।

  6. कम्पोस्ट के ढेर को अन्त मे बीना गीला करें छोड़े। फिर ढेर का तापमान देखें अगर तापमान सामान्य रहे तो इसका तात्पर्य है कि किण्वन (खाद सडने की प्रक्रिया) अभी प्रारम्भ नही हुई है। ढेर को छूने पर गर्म लगना व तापमान 55-60 सेन्टग्रेड होना किण्वन का प्रारम्भ होना दर्शाता है। यह स्थिति ढेर तैयार होने के 3-3 दिन के बाद निर्मित होती है।

  7. 9 से 10 दिन के पश्चात् ढेर को पहली बार ऊपर-नीचे करते हैं। परतों को इस प्रकार पलटते हैं कि जो पहले बाहर थे अब अन्दर हो और जो पहले अन्दर थे अब वे बाहर हो जावे।

  8. पलटने के दोरान ढेर को नम करना चाहिये विशेषकर ऊपर की परत। ज्यादा नमी को हटा देना चाहिये व ढेर की ऊंचाई 1 से 1.5 गज तक रखना चाहिये।

  9. कुछ समय इसे ऐसे ही छोड़ देना चाहिये, परन्तु इसका तापमान जांचते रहना चाहिये क्योंकि किण्वन प्रक्रिया फिर से प्रारम्भ होना जरुरी है।

  10. जब तापमान दोबारा से कम होने लगे ता ढेर को फिर से पलटना चाहिये। दूसरी बार पलटने के बाद फिर से ढेर को नमी देना चाहिये, तापमान जांचे यदि तापमान मे पुनः बढ़ोतरी न हो तो उसका मतलब है कि पदार्थ ह्यूमस मे बदल चुका है। कभी-कभी काला रंग हो जावे व ह्यूमस की गन्ध भी आने लगे परन्तु तापमान मे बढ़ोतरी चलती रहे तो हमें तापमान के कम होने तक इन्तजार करना चाहिये, ध्यान रहे तापमान फिर से न बढ़े।

  11. कम्पोस्ट के ढेर को हर दूसरे दिन पलटते रहें परन्तु पानी नही डाले और ढेर की ऊँचाई को अधिक न बड़ने दें। जब ढेर मे नमी 35 से 40 प्रतिशत हो तो कम्पोस्ट/खाद तैयार हो जाता है।

  12. जब गड्डा खाद बनकर तैयार हो जाता है तो यह देखने में चायपत्ती के चूरे जैसा लगता है और इसमें दुर्गन्ध नहीं होती है।

  13. खाद 90 दिन में बनकर तैयार होती है।

  14. खेत की फसल के लिये प्रति बीघा 2 से 3 टन गाड्‌डा खाद डालना चाहिए।

केंचुआ खाद

केंचुआ खाद, सर्वोत्तम खाद में से एक है। पहले हमारे खेतो में कई केंचुए प्राकृतिक रूप से पाए जाते थे परन्तु लगातार रासायनिक कीटनाशक और उर्वरको के प्रयोग से यह खत्म होते जा रहे है। केंचुआ, किसान का सर्वोत्तम मित्र है जो खेत की मृदा में उपस्थित जैविक अवशेष को खाकर खाद के रूप में परिवर्तित करता है, साथ ही मृदा को लगातार पलट कर उसे मुलायम बना देता है जिससे मृदा में वायु एवं जल का प्रवाह बढ़ जाता है।

केंचुआ खाद बनाने की विधि

  1. सबसे पहले कचरे जिस जैविक अवशेष अपशिष्ट से खाद तैयार की जाना है उसमे से कांच, पत्थर, पोलीथिन हो उसे अलग कर लेते हैं। उसे अलग ढेर बनाकर आधा अपघटित होने तक रखते है।

  2. भूमि के ऊपर बेड तैयार करें, बेड को लकड़ी की सहायता से पीटकर पक्का व समतल बना लें।

  3. इस तह पर 6-7 से0 मी0 (3-3 इंच) मोटी बालू रेत या बजरी की तह बिछायें।

  4. बालूरेत की इस तह पर 6 इंच मोटी दोमट मिट्टी की तह बिछायें। दोमट मिट्टी न मिलने पर काली मिट्टी में पत्थर की खदान का बारीक चूरा मिलाकर बिछायें।

  5. इस पर आसानी से अपघटित हो सकने वाले कृषि अपशिष्ट पदार्थ जैसे नारीयल की बूछ, मक्का, बाजरा या ज्वार के पत्ते और डंठल की दो इंच मोटी सतह बनाये।

  6. इसके ऊपर 3-3 इंच पकी हुई गोबर खाद डाले।

  7. केचुँओं को डालने के उपरान्त इसके ऊपर गोबर, पत्तीया, कृषि अपशिष्ट आदि की 6 से 8 इंच की सतह बनाये। अब इसे मोटी जूट के बोरे से ढांक दे।

  8. झारे की सहायता से जूट के बोरे पर आवश्यकतानुसार प्रतिदिन पानी छिड़कते रहे, ताकि 45 से 50 प्रतिशत नमी बनी रहे। ध्यान रखे कि अधिक नमी या गीलापन नहीं हो ऐसा होने पर हवा अवरूद्ध हो जाती है और सूक्ष्म जीवाणु तथा केचुएं ठीक से कार्य नहीं कर पाते है और केचुएं मर भी सकते है।

  9. इस बेड के ऊपर छाया की व्यवस्था करे क्यूंकि अधिक तापमान होने पर केंचुए मर सकते है, बेड का तापमान 35 से 30 डिग्री सेन्टीग्रेड होना चाहिए।

  10. बेड में गोबर की खाद कड़क हो गयी हो या ढेले बन गये हो तो इसे हाथ से तोड़ते रहे तथा सप्ताह में एक बार बेड का कचरा पलट दे।

  11. 30 दिन बाद छोटे छोटे केंचुए दिखना शुरू हो जाते है।

  12. इसके बाद हर सप्ताह दो बार कूड़े-कचरे की तह पर तह बिछाएं। बायोमास की तह पर पानी छिड़क कर नम करते रहें।

  13. 43 दिन बाद पानी छिड़कना बंद कर दें।

  14. केंचुआ खाद को छानकर केंचुओ को अलग कर ले तथा फिर से उपरोक्त प्रक्रिया को दोहरायें। इस प्रकार हर 45 से 50 दिन में खाद तैयार हो जाती है।

जीवामृत

जीवामृत तैयार करने की विधि के लिए एक मध्यम क्षमता वाला नाद लें। इसमें गोबर, मिटटी, बेसन, गौमूत्र और गुड़ डालकर अच्छे से सभी सामग्री को मिला ले। इस घोल को 2-3 दिन के लिए छाया में सड़ने के लिए रख दें। ऊपर से सूती बोरा से ढक दें। इसे दिन में दो बार हिलाते रहें। इसके सड़ने के समय मीथेन, अमोनिया, कार्बन डाई ऑक्साइड, कार्बन मोनो ऑक्साइड जैसे हानि पहुंचाने वाले गैस का निर्माण होता है। सूती बोरे मे छेद होते है, उन्ही छेदों से ये हानिकारक गैस वातावरण में निकल जाते हैं। 7 दिनों के अन्दर ये घोल उपयोग में लाने के लिए ज्यादा उपयुक्त है। जिस समय फसल पर या खेत में पौधों पर ये खाद डालना है, उसी समय अन्य फसलों जैसे धान, गेहूं, महुआ, मक्का आदि में उपयोग करने के लिए 1 लीटर गौमूत्र से बना हुआ जीवामृत खाद को 20 लीटर साफ पानी में मिलाकर घोल तैयार करें एवं उसे सीधा खेतों में उपयोग करें। श्री जीवामृत खाद जो तैयार है उसे डिब्बों में छेद कर विभिन्न फसलों में जा रहे पानी, विभिन्न सिंचाई नाली में भी डिब्बा उलटकर बूंद-बूंद गिराकर मुख्य फसल में पूरे खेत में जीवामृत खाद को फैलाया जाता है। यदि सब्जी, मसाला, पेड़ पौधे आदि फसलों के लिए उपयोग में लाना है तो एक लीटर गौमूत्र से बना हुआ जीवामृत खाद को 10 लीटर पानी में घोल कर प्रयोग करे। इसी प्रकार पेड़ पौधों पर भी उचित अंतराल पर 1 लीटर गौमूत्र से बना हुआ जीवामृत खाद को 10 लीटर पानी के हिसाब से प्रत्येक बार इस्तेमाल करना चाहिए।

जीवामृत बनाने हेतु निम्न सामग्री की आवश्यकता पडती है :

क्र.सं.सामग्री का नाममात्रा1देशी गाय का गौ-मूत्र के साथ देशी बैल अथवा भैंस का भी पेशाब मिलाया जा सकता है।10 लीटर2मीठा गुड़ या गुड़ के स्थान पर 4 लीटर गन्ने का रस।1 किलोग्राम3देशी गाय का गोबर व देशी बैल या भैंस का गोबर भी मिश्रित करके उपयोग कर सकते है।10 किलोग्राम4बेसन या कोई भी दाल जैसे चना, मसूर, मूँग, उड़द, अरहर एवं अन्य।1 किलोग्राम5जीवाश्म युक्त मिट्टी जैसे आरी पर की मिट्टी या जंगल की मिट्टी जहां पर रसायन का उपयोग न हुआ हो।1 अंजुली

मटका खाद

तीनों प्रकार की पत्तियों को पीस कर या काटकर गाय के गोबर तथा मूत्र के मिश्रण में मिलाएँ। फिर उसमें गुड़ डालें। गुड़ डालने के बाद पूरे मिश्रण को अच्छी तरह मिला लें। बर्तन को पॉलिथीन से ढ़क कर वायुरोधक बना लें तथा छाया वाले स्थान में रखें। मिश्रण को 2 से 3 दिनों के अन्तराल पर एक लकड़ी से मिला दें। 10 से 15 दिनों के बाद यह मिश्रण उपयोग के लिए तैयार हो जाता है। औषधीय मटका खाद को फसल पर चौड़े मुँह वाले बर्तन या झाडू के द्वारा छिड़क कर उपयोग किया जाता है।

मटका खाद बनाने हेतु निम्न सामग्री की आवश्यकता पडती है:

क्र.सं.सामग्री का नाममात्रा1गाय का गोबर10 किलोग्राम2गौमूत्र20 लीटर3नीम की पत्ती10 किलोग्राम4करंज की पत्ती10 किलोग्राम5आंकडा की पत्ती10 किलोग्राम6गुड़500 ग्राम7मटका / नाद1 नंग

नीमास्त्र

सर्वप्रथम 5 किलोग्राम नीमा की पत्तियों को पत्थर की सहायता से पीस ले। इस चटनी को एक पात्र में रख ले और 5 किलोग्राम नीम के फल (निम्बोली) पीस व कूटकर डालें। 5 लीटर गोमूत्र व 1 किलोग्राम गाय का गोबर डालें। इन सभी सामग्री को डंडे से चलाकर जालीदार कपड़े से ढक दें। 48 घंटे में चार बार डंडे से चलाएं, यह 48 घंटे में तैयार हो जाएगा।

नीमास्त्र बनाने हेतु निम्न सामग्री की आवश्यकता पडती है :

क्र.सं.सामग्री का नाममात्रा1नीम की पत्तियाँ5 किलोग्राम2निम्बोली5 किलोग्राम3गाय का गोबर1 किलोग्राम4गौमूत्र5 लीटर

ब्रह्मास्त्र

1/2 लीटर नीम का तेल, 1/2 लीटर पानी में भिगोया हुआ तंबाकू को 6 लीटर गौमूत्र में अच्छी तरह मिलाएँ। इस मिश्रण के साथ 500 ग्राम पीसा हुआ लहसुन, 250 ग्राम पीसी हुई अदरक तथा 250 ग्राम पीसी हुई मिर्च को मिलाएँ। इसको 6 घंटे के लिए बिना छेड़-छाड़ किये रख दें। एक अन्य बर्तन में 100 लीटर पानी में 50 ग्राम साबुन पाउडर (चूर्ण) डालें। अब पहले बनाए गए मिश्रण एवं यह ब्रह्मास्त्र फसल में रोपाई के 15 और 40 दिन के उपरांत उपयोग किया जाता है।

ब्रह्मास्त्र बनाने हेतु निम्न सामग्री की आवश्यकता पडती है :

क्र.सं.सामग्री का नाममात्रा1नीम का तेल500 ग्राम2तम्बाकू की पत्तीयां250 ग्राम3लहसून पीसा हुआ500 ग्राम4अदरक पीसा हुआ250 ग्राम5हरी मिर्च पीसी हुई250 ग्राम6साबुन पाउण्डर चूर्ण50 ग्राम

अग्नि अस्त्र

10 लीटर देसी गाय का गौमूत्र लें, 200 ग्राम गाय का गोबर, उसमें 400 ग्राम तम्बाकू को कूटकर डालें उसमें 200 ग्राम तीखी हरी मिर्च कूटकर डालें, उसे गौमूत्र मे 200 ग्राम देसी लहसुन एवं 5 किलोग्राम नीम के पत्तों को कुट-कुट कर डालें। लकड़ी से इस गौमूत्र को घोले बाद में उस बर्तन से ढककर रखें ओर बने हुए घोल को उबालें। चार बार उबाल आने के बाद उस बर्तन को नीचे रखे। 48 घंटे तक ठंडा होने के लिए ढक्कन सहित वैसे ही छोड़ दे व 48 घंटे के बाद उस घोल को कपडे से छान लें और प्लास्टिक के बर्तन या बोतल मे भरकर रखें। 1 लीटर पानी में 50 मिलीलीटर यह अग्नि अस्त्र मिलाकर फसल पर छिडकाव करें। इसे तीन महीने तक उपयोग में लाया जा सकता है। कीड़ों के लिए 30 एम.एल. अग्निअस्त्र के साथ 30 एम.एल. ब्रह्मस्त्र मिलाकर प्रति लीटर पानी में घोलकर छिडकाव करना चाहिए। छोटे एवं बड़े पौधों पर इन कीड़ो के नियंत्रण के लिए 50-60 मिलीलीटर अग्निअस्त्र प्रति लीटर पानी के घोल के हिसाब से इस्तेमाल करें।

अग्निअस्त्र बनाने हेतु निम्न सामग्री की आवश्यकता पडती है:

क्र.सं.सामग्री का नाममात्रा1देसी गाय का गौमूत्र10 लीटर2गाय का गोबर200 ग्राम3तम्बाकू400 ग्राम4तीखी हरी मिर्च200 ग्राम5देसी लहसुन200 ग्राम6नीम के पत्ते5 किलोग्राम7पानी1 लीटर

दशपर्णी अर्क

सर्वप्रथम एक मिट्टी के बर्तन/नांद में 200 लीटर पानी डाले। फिर इस बर्तन/नांद में करंज, सीताफल, आक, पपीता, नीम, धतूरा, रतनजोत, बेसरम, दूधी, कनेर की पत्तियों को पत्थर पर पीसकर चटनी बना ले और इन सारे पदार्थो को बर्तन/नांद में 200 लीटर पानी में डाल देवे और डंडे से मिला ले। इस पात्र को जालीदार कपडे से बंद कर देवे। एक सप्ताह तक समय समय पर इसे डंडे की सहयता से चलाकर अच्छे से मिलाते रहे। अच्छी तरह से सडने पर सभी पत्तियों का अर्क इस पानी में आ जाता है। एक सप्ताह में दशपर्णी अर्क तैयार हो जाता है। इस अर्क को ठीक से छानकर संग्रहीत कर ले।

दशपर्णी अर्क बनाने हेतु निम्न सामग्री की आवश्यकता पडती है:

क्र.सं.सामग्री का नाममात्रा1साफ पानी200 लीटर2आंकड़ा के पत्ते2 किलोग्राम3पपीता के पत्ते2 किलोग्राम4नीम के पत्ते5 किलोग्राम5करंज के पत्ते2 किलोग्राम6बेसरम के पत्ते2 किलोग्राम7धतुरा के पत्ते2 किलोग्राम8रतनजोत के पत्ते2 किलोग्राम9दूधी के पत्ते2 किलोग्राम10कनेर के पत्ते2 किलोग्राम11सीताफल के पत्ते2 किलोग्राम

सत्र 9 : हांगड़ी खेती तंत्र अंतर्गत प्रथम स्तर के उत्पादन का आंकलन

मुख्य बिन्दु : हांगडी खेती अन्तर्गत प्रथम स्तर के उत्पादन का आंकलन करने के लिए सहभागी किसानों के साथ चर्चा कर जानकारी प्राप्त करना।

सत्र 10 : हांगड़ी खेती तंत्र अंतर्गत द्वितीय स्तर के उत्पादन का आंकलन

मुख्य बिन्दु : हांगडी खेती में द्वितीय स्तर के उत्पादन का आंकलन करने के लिए सहभागी किसानों के साथ चर्चा कर जानकारी प्राप्त करना।

सत्र 11 : हांगड़ी खेती तंत्र अंतर्गत तृतीय स्तर के उत्पादन का आंकलन

मुख्य बिन्दु : हांगडी खेती अन्तर्गत तृतीय स्तर के उत्पादन का आंकलन करने के लिए सहभागी किसानों के साथ चर्चा कर जानकारी प्राप्त करना।

सत्र 12 : हांगडी खेती तंत्र अंतर्गत बीज संरक्षण

चर्चा के बिन्दु

किसान खेत पाठशाला में उपस्थित सहभागी किसानो से चर्चा करके उनके पूर्वज या वे स्वयं किस प्रकार से बीजो को पारंपरिक संरक्षण करते है? इस विषय पर चर्चा करे तथा प्राप्त बीज संरक्षण के तरीको का दस्तावेजीकरण करे। तत्पश्चात उनके साथ निम्नलिखित पारंपरिक बीज संरक्षण की पद्धतियों के बारे में सम्पूर्ण जानकारी प्रदान कर उन्हें परंपरागत रूप से संकलित करने के लिए प्रेरित करे।

विभिन्न पद्धतियों के माध्यम अपनाकर संगृहीत करते है।

  1. कबला : बांस या अन्य लकड़ी के माध्यम से परंपरागत बीजो के संग्रहण के लिए पात्र 'कबला' बनाये जाते है फिर इन्हें मिटटी और गोबर से लीप दे फिर इन कबला को धुप में सुखाकर इनमे मक्का, धान, गेंहू किया जाता है। संग्रहण से पहले कबले के तले में नीम की पत्तियां बिछाकर बीज डाले बीच बीच में नीम के पत्तो की बिछाकर फिर बीज डाले इस प्रकार कबले को ऊपर तक भर दे तत्पश्चात सबसे उपरी तले पर फिर नीम की पत्तियों को बिछा दे और फिर सबसे ऊपर सागवान या तेंदू पत्ते से ढंक देते है और अंत में गोबर और मिटटी के मिश्रण से लीप कर पैक कर देते है।

  2. मटके में संग्रहण : विभिन्न प्रकार की दालें जैसे उड़द, मुंग, चना, तुअर, झालर, तिलहन जैसे बीज जो अनाज की अपेक्षा कम मात्रा में लगते है उन्हें अलग अलग आकार के मटके में रखते है। मटको में बीज को रखने से पहले धुप में सुखा लेते है इससे किसी भी प्रकार की नमी या फिर कीट नहीं लगते है। संरक्षित किये जाने वाले बीजो को भी धुप में सुखाते है और उसके बाद बीजो को राख में मिलाकर मटके में भर देते है और अंत में मटके के उपरी भाग को गोबर और मिटटी के मिश्रण से लीप कर पैक कर देते है। जब भी बुवाई करना होती है या बीज की आवश्यकता होती है तब उपरी भाग को हटाकर बीज लेते है। इस प्रकार 2 से 3 वर्ष तक बीज सुरक्षित रहता है।

  3. फल को साबुत लटकाकर : कुछ फसल जैसे लोकी, तुरई, झुमकी आदि के बीजो का उनके पके हुए फलो में ही ज्यादा सुरक्षित रखा जा सकता है। इसी प्रकार पकी हुई लौकी को सुखाकर उसका गुदा निकालकर उसे खोखला कर देते है और फिर अच्छे से साफ करके उसमे अन्य सब्जी प्रजाति के बीजो को भरकर कपडे से बंद करते है और उसके ऊपर गोबर व गोमूत्र का लेप कर देते है. इससे बीज सुरक्षित रहता है।

  4. बीज जैसे बेंगन, चवला, मक्का आदि के बीजों के संरक्षण के लिए उसकी गुच्छी बनाकर किसी ऐसी जगह टांग देना चाहिए जहाँ धुप व हवा लगती रहे परन्तु बारिश से बचाव हो सके।

  5. प्याज और लहसुन के बीजो को सहेजकर रखने के लिए इनकी गठिया बांधकर इन्हें हवादार परन्तु अँधेरे कमरे में टांगने से सुरक्षित रहते है।

  6. सरसों और अरंडी के तेल का प्रयोग भी इसी तरह के बीजो को सुरक्षित रखने के उपयुक्त होते है। इसके लिए बीजो को तेल के साथ तब तक मिलाते है जब तक की बीज तेल से चमकने न लग जाये।

  7. अदरक, हल्दी, अरबी, मुसली आदि को बीज के लिए सहेजने के लिए खेत के एक कोने में गड्डा खोदकर उसमे बीज रखकर घांस-फुंस से ढक देते है।

  8. सागवान या ढ़ाक के पत्ते पर बीजो को चिपकाकर : जिन फलो में चिकनाई होती है जैसे टमाटर, ककड़ी आदि के बीजो को सागवान के पत्ते पर छिड़क देते है यह बीज पत्ते पर चिपक जाते है। इन पत्तो को किसी ऊँचे स्थान पर लटकाकर रख दिया जाता है। जब अगले सीजन में बीज की जरुरत होती है तो पत्ते को रगड़कर बीजो को निकाल सकते है और बुवाई कर सकते है। इससे बीज हमेशा सुरक्षित रहता है।

सत्र 13 : खेती से प्राप्त उत्पादन का, सामान्य खेत से प्राप्त उत्पादन से तुलनात्मक आंकलन

चर्चा के बिंदु : किसान खेत पाठशाला में उपस्थित सहभागी किसानो से चर्चा करके सामान्य खेत से हुए उत्पादन का हांगडी खेत से प्राप्त कुल उत्पादन के साथ चर्चा करे तथा उनका दस्तावेजीकरण निम्न तलिकानुसार करे।

किसान का नामहांगडी खेती से प्राप्त कुल फसल उत्पादन (Kg.)हांगडी खेती से प्राप्त कुल चारा उत्पादन (Kg.)अन्य खेती से प्राप्त कुल फसल उत्पादन (Kg.)अन्य खेती से प्राप्त कुल चारा उत्पादन (Kg.)

सत्र 14 : हांगडी खेती अंतर्गत आयोजित किसान खेत पाठशाला से प्राप्त सीख एवं पाठशाला को बेहतर बनाने हेतु सुझाव

चर्चा के बिंदुः किसान खेत पाठशाला में उपस्थित सहभागी किसानो से चर्चा करे तथा किसानो को इस पाठशाला के आयोजन से उन्होंने क्या सीखा एवं पाठशाला को बेहतर बनाने के लिए उनके सुझाव अनिवार्य रूप से प्रपत्र अनुसार दस्तावेजीकरण करे।

किसान का नाम

मुख्य सीख 1

मुख्य सीख 2

सुझाव

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