Importance of Summer Moong Cultivation in Tribal Areas
Published on May 16, 2026
Summary
This document outlines the importance, benefits, and challenges of summer moong cultivation for tribal farmers in Southern Rajasthan, highlighting its potential to increase income, improve soil fertility, and enhance nutrition, while seeking government support for water and seeds.
जनजातीय क्षेत्र में ग्रीष्मकालीन मूंग की खेती की महत्ता
पृष्ठभूमि
- जनजातीय क्षेत्र में अधिकांश छोटी जोत वाले किसान ।
- मुख्यरुप से भूमि का उबड़-खाबड़ या ढलाऊ होना, जिसके कारण साल दर साल मिट्टी के पोषक तत्व वर्षा जल के साथ बह जाते है, परीणामस्वरुप :-
- जनजातीय क्षेत्र की जमीन की उर्वरा क्षमता का दिनों दिन कमजोर होना ।
- कमजोर आर्थिक स्थिति के कारण किसान द्वारा आवश्यक खाद (रासायनिक और देशी) नहीं डाल पाना, फलस्वरूप फसल उत्पादकता कम होती जा रही है।
- किसान का अन्य राज्यों में मजदूरी की तलाश में पलायन कर जाना |
जनजातीय क्षेत्र में ग्रीष्मकालीन मूंग की खेती की महत्ता
- दक्षिणी राजस्थान के कृषि जलवायु क्षेत्र IV-B के भौगोलिक क्षेत्र में जायद मौसम ग्रीष्मकालीन मूंग की खेती के लिए अनुकूल वातावरण।
- जनजातीय क्षेत्र में मूंग की खेती ज़ायद के मौसम में पारम्परिक रूप से किसानों द्वारा सीमित संसाधनों के उपयोग से सफलतापूर्वक की की जाना |
- इन जनजातीय क्षेत्रों में सिंचाई हेतु पानी की उपलब्धता । वर्तमान में इसका संचालन रबी फसल पर आधारित है ।
ग्रीष्मकालीन मूंग की खेती के संभावित लाभ
- क्षेत्र में वर्ष भर में तीन फसल लेकर - फसल सघनता में वृद्धि
- तीसरी फसल के रूप में ज़ायद कृषि मौसम का पूर्ण लाभ प्राप्त होना
- आर्थिक रूप से कमजोर किसानों की आय में वृद्धि की सुनिश्चितता
- देश के दलहन मिशन में राज्य का समुचित योगदान
- फसल चक्र में दलहन फसल को अपनाते हुए मृदा की भौतिक दशा एवं उर्वरकता में वृद्धि
ग्रीष्मकालीन मूंग की खेती के लिए पूर्व में किये गए प्रयास
वर्ष 2016-17 में वाग्धारा द्वारा जनजातीय विकास विभाग के साथ मिलकर बांसवाडा की जनजातीय क्षेत्र के 1000 महिला किसानों के साथ "ग्रीष्मकालीन मूंग" की खेती करवाने का एक महत्वपूर्ण प्रयोग किया गया। उस प्रयोग के परिणाम किसान के खेत की मिट्टी और अन्य फसल में उत्पादन बढाने में भी बहुत उपयोगी भी रहे थे। इस प्रयोग ने क्षेत्र के फसल तंत्र को सुधारने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी।
परिणामः -
- प्रत्येक महिला किसानों को 70-75 दिनों के भीतर 1-1.5 क़्वींटल ग्रीष्मकालीन मूंग का उत्पादन मिला
- प्रत्येक समूह की महिला की पारिवारिक आय में वृद्धि हुई है।
- उत्पादित मूंग के विक्रय से प्रत्येक लघु एवं सीमान्त कृषक परिवार को 7 हजार से 8 हजार रूपए तक का लाभ मिला।
- परिवारों के लिए मूंग दाल की खपत हेतु उपलब्धता भी 3-4 महीने से बढ़कर 12 महीने तक हो गयी ।
- इसके नियमित उपभोग से परिवार के सदस्यों, विशेष रूप से बच्चों के पोषण स्तर में वृद्धि सुनिश्चित हो सकी।
- इन खेत विशेष में मूंग की जड़ों में राइजोबियम जीवाणु और उसकी नाइट्रोजन स्थरीकरण प्रवृति के कारण मृदा की उर्वरा क्षमता में वृद्धि हुई जिसके चलते खरीफ फसल मक्का एवं धान के अंकुरण में, रोग-प्रतिरोधक क्षमता में भी सुधार हुआ।
ग्रीष्मकालीन मूंग की खेती के लिए चुनौतियां
- सिंचाई का पानी रबी की खेती के लिए प्रतिबंधित है। इसका समापन इसके 120 दिनों के कार्यक्रम के अनुसार आम तौर पर मार्च महीने के आसपास यानी रबी के मौसम के समापन तक किया जाता है।
- जायद मूंग की बुवाई आम तौर पर मार्च महीने के अंत से अप्रैल के मध्य तक शुरू की जाती है, खेती को समर्थन देने के लिए इसकी सुचारू बुवाई के लिए तत्काल सिंचाई के पानी की आवश्यकता होती है।
- जायद में मूंग की खेती करने वाले किसानों को पशुओं के द्वारा खेती चरने की समस्या होना ।
- गुणवत्तापूर्ण बीज की उपलब्धता एक मुद्दा है जिसे हमेशा महसूस किया जाता है। गुणवत्ता वाले बीजों की कमीं के कारण आदिवासी किसान आमतौर पर अपने बचे हुए उत्पाद के साथ फसलों की खेती करते हैं, जिससे इसकी खेती में कीट समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
सरकार से अपेक्षित सहयोग
बांसवाड़ा जिले में ग्रीष्मकालीन मूंग के उत्पादन को नए आयाम प्रदान करने हेतु वाग्धारा संस्था कृषि विभाग/जिला प्रशासन से निम्न प्रशासनिक सहयोग अपेक्षित है :-
- सिंचाई हेतु नहरों के पानी की उपलब्धता के दिनों में बढ़ोत्तरी करवाना (कम से कम 15 मई तक)।
- जायद मूंग की बुवाई क्षेत्रों में मवेशियों के प्रबंधन हेतु पंचायतों को पाबन्द करवाना।
- उपयुक्त मात्रा में मूंग के उन्नत किस्म के बीज की उपलब्धता सुनिश्चित करवाना।
- जिले में कृषि विभाग को तीसरी फसल के लिए पाबन्द करवाना।